ऋषिकेश | 23 जनवरी 2026
कभी-कभी इंसान अपने कर्मों से मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है। ऋषिकेश के 42 वर्षीय राजमिस्त्री रघु पासवान ने ऐसा ही उदाहरण पेश किया है। एक सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड घोषित किए गए रघु पासवान के अंगदान से देश के पांच जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन मिल सकेगा। उनके इस निर्णय ने मानवता, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल कायम की है।
सड़क हादसे के बाद ब्रेन डेड घोषित
रघु पासवान कुछ दिन पहले एक निर्माणाधीन तीन मंजिला भवन से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें तुरंत एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई और वह नॉन-रिवर्सिबल कोमा में चले गए। न्यूरो सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. रजनीश अरोड़ा ने बताया कि सभी चिकित्सकीय जांचों और विशेषज्ञों की समिति की समीक्षा के बाद गुरुवार को उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया गया।
परिवार की सहमति से लिया गया अंगदान का निर्णय
इस कठिन घड़ी में चिकित्सकों की टीम ने महापौर शंभू पासवान के सहयोग से रघु पासवान के परिजनों से संपर्क किया और उन्हें अंगदान के महत्व के बारे में विस्तार से समझाया। गहन काउंसलिंग के बाद परिवार ने साहसिक और मानवीय निर्णय लेते हुए अंगदान की सहमति दी। इसके बाद शुक्रवार को एम्स ऋषिकेश में केडवरिक ऑर्गन डोनेशन की प्रक्रिया पूरी की गई।
तीन बड़े संस्थानों तक पहुंचे अंग
रघु पासवान के अंगों को देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों—पीजीआई चंडीगढ़, एम्स दिल्ली और आर्मी हॉस्पिटल (आरआर) दिल्ली—भेजा गया। इन अंगों के माध्यम से कुल पांच मरीजों को जीवनदान मिलने की उम्मीद है। एम्स ऋषिकेश में यह केडवरिक ऑर्गन डोनेशन का दूसरा सफल मामला है।
नौ जिलों में बना ग्रीन कॉरिडोर
अंगों को तय समय में गंतव्य तक पहुंचाने के लिए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के नौ जिलों की पुलिस ने मिलकर ग्रीन कॉरिडोर बनाया। इसमें एम्स ऋषिकेश से जौलीग्रांट एयरपोर्ट, फिर दिल्ली और चंडीगढ़ के अस्पतालों तक का रूट शामिल रहा। इस समन्वय ने अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को समयबद्ध और सफल बनाया।
हवाई और सड़क मार्ग से भेजे गए अंग
एम्स ऋषिकेश के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. श्रीलोय मोहंती ने बताया कि आर्मी हॉस्पिटल दिल्ली के लिए हृदय को दोपहर एक बजे हवाई मार्ग से भेजा गया, जो 2:30 बजे मरीज के बेड तक पहुंच गया। इस उड़ान की व्यवस्था स्वयं अस्पताल की ओर से की गई थी। वहीं, एम्स दिल्ली के लिए एक किडनी दोपहर एक बजे भेजी गई, जो शाम 4:42 बजे सुरक्षित रूप से पहुंच गई।
बिहार से ऋषिकेश तक संघर्ष की कहानी
महापौर शंभू पासवान ने बताया कि रघु पासवान मूल रूप से बिहार के बेतिया जिले के लौकरिया गांव के निवासी थे। वह रोजी-रोटी के लिए ऋषिकेश के मनसा देवी क्षेत्र में रहकर राजमिस्त्री का काम कर रहे थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने मेहनत और ईमानदारी से जीवन जिया, और अंत में मानवता के लिए सबसे बड़ा योगदान देकर अमर हो गए।
निष्कर्ष
रघु पासवान भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके अंगों से धड़कती पांच जिंदगियां उन्हें हमेशा जीवित रखेंगी। उनका यह निर्णय समाज को अंगदान के प्रति जागरूक करने वाली प्रेरणा है। रघु पासवान ने यह साबित कर दिया कि सच्ची अमरता जीवन के बाद भी दूसरों को जीवन देने में है।


