देहरादून | उत्तराखंड
दिनांक: 9 फरवरी 2026
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण को लेकर चल रही अटकलों पर कांग्रेस चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने बड़ा और दो टूक बयान देकर सियासी हलचल तेज कर दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पार्टी में किसी का भी टिकट पहले से फाइनल नहीं है, चाहे वह कितना ही बड़ा नेता या शीर्ष नेतृत्व के कितना ही करीब क्यों न हो।
कार्यकर्ताओं के एक कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. हरक सिंह रावत ने कहा कि कुछ लोग अभी से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का नाम लेकर यह दावा कर रहे हैं कि उनका टिकट पक्का हो चुका है। इस पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा,
“अरे, टिकट तो राहुल गांधी का भी फाइनल नहीं है।”
उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और राजनीतिक गलियारों में इसकी खूब चर्चा हो रही है।
डॉ. रावत ने स्पष्ट किया कि पार्टी ने उन्हें प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति की जिम्मेदारी दी है और वे उसी जिम्मेदारी के तहत निष्पक्ष और जीत की संभावना के आधार पर टिकट वितरण करेंगे। उन्होंने कहा कि उनके पास रोजाना टिकट के लिए सिफारिशें आ रही हैं, लेकिन पार्टी का स्टैंड बिल्कुल साफ है—
टिकट उसी को मिलेगा जो चुनाव जीतने की क्षमता रखता हो।
उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि उम्मीदवार चयन में किसी तरह की नजदीकी या गुटबाजी आड़े नहीं आएगी। चाहे कोई हरक सिंह रावत का करीबी हो, गोदियाल का या प्रीतम सिंह का—यदि वह सीट जीतने की स्थिति में नहीं है, तो उसे टिकट नहीं मिलेगा।
“मैं पार्टी का सिपाही हूं”
अपने बयान में डॉ. हरक सिंह रावत ने खुद को पार्टी का अनुशासित कार्यकर्ता बताते हुए कहा,
“जिस सीट से कोई चुनाव नहीं लड़ेगा, वहां से मैं खुद चुनाव लड़ूंगा। और अगर जरूरत पड़ी तो पार्टी के लिए दरी बिछाऊंगा और नारे भी लगाऊंगा।”
उनके इस बयान को पार्टी के प्रति समर्पण और अनुशासन का संकेत माना जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान नारेबाजी को लेकर उठे सवालों पर भी उन्होंने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा (गोदियाल) के लिए नारे लगाना पार्टी के लिए नारे लगाने जैसा है। वहीं, ज्योति रौतेला के समर्थन में नारे लगाकर वे महिलाओं के समर्थन और भागीदारी को मजबूत करने का संदेश दे रहे हैं।
निष्कर्ष
डॉ. हरक सिंह रावत का यह बयान साफ संकेत देता है कि उत्तराखंड कांग्रेस इस बार टिकट वितरण में “जीत की क्षमता” को ही सबसे बड़ा पैमाना बनाएगी। बड़े नाम, सिफारिशें और नजदीकियां पीछे रह जाएंगी, जबकि जमीनी पकड़ और चुनाव जीतने की ताकत रखने वाले नेताओं को ही मौका मिलेगा। ऐसे में कांग्रेस के भीतर टिकट की दौड़ और भी दिलचस्प और प्रतिस्पर्धी होती नजर आ रही है।


