BREAKING

उत्तराखंड की राजधानी का हाल: कागज़ों में सड़कें दुरुस्त, हकीकत में अब भी गड्ढों से भरी राहें

 देहरादून, 25 अक्तूबर 2025


दीपावली तक गड्ढामुक्त सड़कों का दावा, पर जमीनी सच्चाई कुछ और

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कि दीपावली से पहले राज्य की सभी शहरी सड़कें गड्ढामुक्त होनी चाहिएं, लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) के दावे और धरातल की सच्चाई में ज़मीन-आसमान का फर्क नजर आ रहा है।

विभाग ने दावा किया है कि 95 प्रतिशत सड़कें दुरुस्त कर दी गई हैं, मगर राजधानी देहरादून से लेकर मसूरी, रुड़की, ऋषिकेश और हरिद्वार तक कई सड़कें आज भी गड्ढों में कराह रही हैं।


शहरों की सड़कों पर अब भी गड्ढों का कब्जा

देहरादून के गांधी रोड, इंदर रोड और देहराखास इलाकों में जगह-जगह सड़कें टूटी पड़ी हैं। राजधानी की ये सड़कें हर दिन हजारों लोगों के सफर को जोखिम भरा बना रही हैं।

मसूरी में मोतीलाल नेहरू मार्ग, वेवरली चौक, लाइब्रेरी चौक से जीरो प्वाइंट कैंप्टी रोड तक गहरे गड्ढे यात्रा को चुनौती बना रहे हैं।

रुड़की के डीएवी कॉलेज रोड, ऋषिकेश के श्यामपुर, लक्कड़घाट, खदरी रोड, और हरिद्वार के लक्सर, खानपुर, बहादराबाद ब्लॉक की सड़कें जगह-जगह उखड़ी हुई हैं।

धनोरी मार्ग, लक्सर-पुरकाजी मार्ग, खानपुर बाइपास, बेगमपुर औद्योगिक क्षेत्र और मीठी बेरी से मंगोलपुरा दिल्ली फार्म तक सड़कों की हालत चिंताजनक बनी हुई है। वहीं नई टिहरी में लोनिवि की तीन सड़कें वाशआउट के कारण अभी भी बाधित हैं।


लोनिवि के दावे पर उठ रहे सवाल, जनता में नाराज़गी

लोनिवि का कहना है कि अधिकांश सड़कों की मरम्मत पूरी हो चुकी है, पर शहरवासी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग ने केवल ऊपरी परत पर मरम्मत का दिखावा किया है, जबकि मूल समस्या जस की तस बनी हुई है।

कई जगहों पर छोटे गड्ढों को अधूरा भरा गया, जो अब आधे फीट गहरे खड्डों में तब्दील हो चुके हैं। इस कारण सड़क हादसों का खतरा भी बढ़ गया है।


हर साल वही जगह, वही गड्ढे — आखिर क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि हर साल लाखों रुपये खर्च कर गड्ढे भरे जाते हैं, लेकिन उसी जगह सड़कें बार-बार क्यों उखड़ जाती हैं?

सड़क विशेषज्ञों का कहना है कि विभाग केवल ऊपर की सतह पर बिटुमिन की परत चढ़ाकर खानापूर्ति करता है, जबकि नीचे की सब-बेस (आधार परत) कमजोर रह जाती है।

बरसात या नमी आने पर यही कमजोर परत बैठ जाती है, और सड़कें फिर से टूट जाती हैं।


निर्माण कंपनियों की जवाबदेही पर भी सवाल

राज्य में करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाली सड़कों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। नियमानुसार, हर निर्माण कंपनी को 1 से 3 वर्ष का डिफेक्ट लाइबिलिटी पीरियड दिया जाता है, जिसके दौरान सड़क में दोष निकलने पर कंपनी को खुद मरम्मत करनी होती है।

लेकिन राज्य में इस नियम का पालन बेहद कमजोर है। नतीजतन, सड़कें बार-बार टूटती हैं और जनता हर साल वही परेशानी झेलती है।


विभाग का दावा — जल्द पूरी होंगी मरम्मतें

लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता राजेश शर्मा ने कहा —
“शहरी क्षेत्रों में सड़कों को 95 प्रतिशत गड्ढामुक्त कर दिया गया है। शेष कार्य भी शीघ्र पूरा कर लिया जाएगा। ग्रामीण इलाकों में भी 31 अक्टूबर तक सभी सड़कें दुरुस्त कर दी जाएंगी।”


निष्कर्ष — कागज़ी दावे बनाम सड़क की सच्चाई

उत्तराखंड की राजधानी और प्रमुख शहरों की सड़कें इस समय दावों और हकीकत के बीच फँसी हुई हैं। जहां सरकारी फाइलों में सड़कें दुरुस्त बताई जा रही हैं, वहीं जमीनी स्तर पर गड्ढे अब भी लोगों की परेशानी बने हुए हैं।

आवश्यक है कि विभाग केवल रिपोर्टों तक सीमित न रहे, बल्कि सड़कों की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी रखे ताकि अगली दीपावली तक जनता को वाकई “गड्ढामुक्त सफर” का अनुभव हो सके।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *