देहरादून, 16 जुलाई 2025
प्रार्थना सभा में धार्मिक ग्रंथ? शिक्षकों ने उठाए सवाल
उत्तराखंड के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान श्रीमद्भगवद् गीता के श्लोक पढ़ाए जाने के निर्देश को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जहां शिक्षा विभाग ने इसे छात्रों के नैतिक विकास का हिस्सा बताया, वहीं एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन ने इस निर्णय को संविधान विरोधी और भेदभावपूर्ण करार दिया है।
शिक्षा निदेशक को सौंपा विरोध पत्र
एससी-एसटी शिक्षक संघ के अध्यक्ष संजय कुमार टम्टा की अगुआई में शिक्षकों ने राज्य शिक्षा निदेशक को एक लिखित ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने गीता के श्लोकों को प्रार्थना सभा में अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने पर आपत्ति जताई।
“अनुच्छेद 28(1) के अनुसार, सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती। यह निर्देश संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के खिलाफ है।”
— संजय कुमार टम्टा, अध्यक्ष, एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन
संवैधानिक पहलू पर सवाल
एसोसिएशन ने तर्क दिया कि यह निर्देश भारत के संविधान द्वारा परिभाषित धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रणाली के विरुद्ध है। सरकारी स्कूलों में विभिन्न धर्मों और जातियों के छात्र पढ़ते हैं। ऐसे में किसी एक धर्म से जुड़ी सामग्री को अनिवार्य करना छात्रों के बीच भेदभाव और असहजता को जन्म दे सकता है।
अनिवार्य श्लोक पढ़ाने पर आपत्ति
एसोसिएशन का कहना है कि गीता के श्लोकों को यदि वैकल्पिक रूप से, नैतिक शिक्षा के एक भाग के तौर पर शामिल किया जाए और सभी धार्मिक ग्रंथों को समान महत्व मिले, तब विचार किया जा सकता है। लेकिन किसी एक ग्रंथ को प्राथमिकता देना सामाजिक समरसता और समावेशी शिक्षा प्रणाली के खिलाफ है।
शिक्षा का उद्देश्य वैज्ञानिक सोच
“शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किक सोच और समावेशी मूल्य विकसित करना होना चाहिए, न कि किसी विशेष धार्मिक विश्वास को थोपना।”
— शिक्षक संघ का बयान
मांग: तत्काल निर्देश वापस लिया जाए
एससी-एसटी शिक्षक संघ ने मांग की है कि यह निर्देश तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और भविष्य में किसी भी धार्मिक सामग्री को शैक्षणिक प्रक्रिया में शामिल करने से पहले सभी हितधारकों से परामर्श लिया जाए।
यह मुद्दा अब राज्य में शिक्षा और धर्म के बीच संतुलन पर बहस को फिर से तेज कर सकता है। देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस विरोध पर क्या रुख अपनाता है।


