देहरादून, दिनांक: 2 फरवरी 2026
उत्तराखंड सरकार ने राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों की शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। राज्य में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का औपचारिक गठन कर दिया गया है, जिसकी अध्यक्षता बीएसएम पीजी कॉलेज, रुड़की के सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी को सौंपी गई है। इस प्राधिकरण के गठन के साथ ही राज्य की अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था एकीकृत और पारदर्शी ढांचे में संचालित होगी।
नए प्राधिकरण के अंतर्गत अब राज्य में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा संचालित सभी शैक्षिक संस्थान एक ही मंच पर आएंगे। सरकार के निर्णय के अनुसार 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसके बाद मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त सभी मदरसे भी अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अधीन कार्य करेंगे।
दरअसल, धामी सरकार ने अगस्त 2025 में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू किया था। इससे पहले राज्य में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान का दर्जा मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय तक सीमित था। इस स्थिति को बदलते हुए सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को समान अवसर, मान्यता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से यह अधिनियम लाया गया।
अधिसूचना जारी, संरचना तय
शासन ने मंगलवार को प्राधिकरण के गठन की अधिसूचना जारी कर दी। इसके अनुसार—
- अध्यक्ष: प्रो. (सेवानिवृत्त) सुरजीत सिंह गांधी
- सदस्य सचिव: निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग
अन्य सदस्यों में कुमाऊं विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. सैयद अली हमीद, केजीके पीजी कॉलेज मुरादाबाद के प्रोफेसर गुरमीत सिंह, राजकीय महाविद्यालय कपकोट की सहायक प्राध्यापक डॉ. एल्बा मन्ड्रेले, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रोबिना अमन, सेवानिवृत्त आईएएस चंद्रशेखर भट्ट, चमोली के प्रोफेसर पेमा तेनजिन तथा हिमालय ग्राम विकास समिति गंगोलीहाट के राजेंद्र सिंह बिष्ट शामिल हैं।
पदेन सदस्यों के रूप में महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा और एससीईआरटी निदेशक को भी शामिल किया गया है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर रहेगा फोकस
सरकार के अनुसार, प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य शिक्षा में गुणवत्ता, समानता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण पाठ्यक्रम निर्धारण करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों में उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप शिक्षा दी जाए। हालांकि, संस्थानों की स्थापना और संचालन में प्राधिकरण का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि,
“अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण यह तय करेगा कि बच्चों को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को अब उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी, ताकि शिक्षा का स्तर समान और पारदर्शी रहे।”
खास बातें
- सभी अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को प्राधिकरण से अनिवार्य मान्यता लेनी होगी।
- संस्थानों का सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट में पंजीकरण आवश्यक होगा।
- भूमि, बैंक खाते और संपत्तियां संस्थान के नाम पर होना अनिवार्य।
- वित्तीय अनियमितता, पारदर्शिता की कमी या सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों पर मान्यता रद्द की जा सकेगी।
- शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी की जाएगी।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन राज्य की शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है। मदरसा बोर्ड के विलय और सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को एक समान ढांचे में लाने से न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी, बल्कि छात्रों को आधुनिक, समावेशी और मानक-आधारित शिक्षा का लाभ भी मिलेगा। यह पहल राज्य में शिक्षा सुधार की दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है।


