देहरादून | 6 अप्रैल 2026
उत्तराखंड सरकार ने जमीन से जुड़े विवादों को लेकर एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। अब ऐसे मामलों में पुलिस की सीधी दखलंदाजी पर रोक लगा दी गई है। सरकार के नए निर्देशों के अनुसार, किसी भी लैंड फ्रॉड या भूमि विवाद के मामले में बिना लैंड फ्रॉड कमेटी की संस्तुति के सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी।
यह निर्णय लंबे समय से उठ रहे उन सवालों के बीच लिया गया है, जिनमें आरोप लगाया जाता रहा है कि जमीन विवादों में पुलिस की भूमिका जरूरत से ज्यादा हो जाती है, जिससे कई बार सिविल मामले भी आपराधिक स्वरूप ले लेते हैं।
पहले जांच, फिर होगी पुलिस कार्रवाई
नई व्यवस्था के तहत अब जमीन से जुड़े सभी विवाद पहले लैंड फ्रॉड कमेटी के पास भेजे जाएंगे। कमेटी मामले की जांच और सत्यापन करेगी। यदि जांच में यह पाया जाता है कि मामला वास्तव में धोखाधड़ी या आपराधिक प्रकृति का है, तभी पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए जाएंगे।
सरकार का मानना है कि इस प्रक्रिया से सिविल और राजस्व मामलों में पुलिस की अनावश्यक दखलंदाजी खत्म होगी और केवल वास्तविक अपराधों में ही पुलिस कार्रवाई करेगी।
देहरादून समेत मैदानी जिलों में बढ़ते विवाद बने वजह
प्रदेश में खासतौर पर देहरादून और अन्य मैदानी जिलों में जमीन खरीद-फरोख्त, फर्जी रजिस्ट्री और अवैध कब्जों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। इन मामलों ने प्रशासन और पुलिस दोनों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने यह नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है, ताकि मामलों का निष्पक्ष और व्यवस्थित समाधान हो सके।
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की सलाह पर कदम
भाजपा के वरिष्ठ नेता और हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत पहले भी इस मुद्दे को उठा चुके हैं। उन्होंने सुझाव दिया था कि जमीन विवादों का निपटारा मुख्य रूप से राजस्व और प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से होना चाहिए, जबकि पुलिस को ऐसे मामलों से दूर रखा जाना चाहिए।
सरकार का यह फैसला उनकी इसी सलाह के अनुरूप माना जा रहा है, जिसमें पुलिस के कार्यभार को कम करने और कानून व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही गई थी।
गढ़वाल कमिश्नर की अध्यक्षता में हुई अहम बैठक
इस संबंध में लैंड फ्रॉड कमेटी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता गढ़वाल कमिश्नर एवं मुख्यमंत्री के सचिव विनय शंकर पांडे ने की। बैठक में जमीन विवादों से जुड़े लंबित मामलों की विस्तृत समीक्षा की गई।
समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2021 से अब तक गढ़वाल क्षेत्र में 200 से अधिक लैंड फ्रॉड के मामले लंबित हैं। इन मामलों के समाधान के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्णय लिया गया है।
15 दिन में रिपोर्ट, तीन महीने में निस्तारण का लक्ष्य
कमेटी ने निर्देश दिए हैं कि सभी लंबित मामलों की विस्तृत रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर प्रस्तुत की जाए। साथ ही तहसीलदार और एसडीएम स्तर पर लंबित मामलों का निस्तारण अधिकतम तीन महीने के भीतर करने को कहा गया है।
अब तक करीब 40 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जबकि लगभग 160 मामले अभी भी लंबित हैं। इन मामलों को जल्द सुलझाने के लिए लगातार बैठकें आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।
8 मामलों में एफआईआर के निर्देश
बैठक में कुछ मामलों में स्पष्ट रूप से जमीन धोखाधड़ी के संकेत मिलने पर कमेटी ने 8 मामलों में पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश भी दिए हैं। अन्य मामलों में जांच प्रक्रिया जारी है और संबंधित अधिकारियों से शीघ्र रिपोर्ट मांगी गई है।
नई व्यवस्था पर उठे सवाल भी
जहां सरकार इस नई व्यवस्था को पारदर्शिता बढ़ाने और विवादों को सही दिशा में सुलझाने की पहल मान रही है, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि लैंड फ्रॉड कमेटी की बैठकें नियमित अंतराल पर होनी चाहिए।
एक व्यक्ति ने बताया कि जून 2025 के बाद अब जाकर उसे कमेटी के सामने पेश होने का मौका मिला, जिससे प्रक्रिया में देरी की समस्या भी सामने आई है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड सरकार का यह फैसला भूमि विवादों के समाधान के तरीके में बड़ा बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है। इससे एक ओर जहां पुलिस का अनावश्यक हस्तक्षेप कम होगा, वहीं दूसरी ओर मामलों के निपटारे में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लैंड फ्रॉड कमेटी कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से मामलों का निस्तारण कर पाती है।


