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उत्तराखंड में बाघ संरक्षण की नई पहल: पहली बार तैयार होगी बाघ की भोजन शृंखला की ‘कुंडली’

देहरादून | 29 दिसंबर 2025

डीएनए जांच से खुलेगा जंगल का पोषण चक्र

देश में चल रहे बाघ आकलन कार्यक्रम के तहत इस बार एक ऐतिहासिक पहल की जा रही है। उत्तराखंड में पहली बार बाघ की भोजन शृंखला की कुंडली तैयार की जाएगी। इसके लिए डीएनए जांच का सहारा लिया जाएगा, जिससे यह पता लगाया जा सकेगा कि बाघ किन वन्यजीवों का शिकार करता है, उनकी सेहत कैसी है और उनके भोजन का स्तर क्या है।


दूसरे चरण में होगा ट्रांजिट सर्वे

बाघ आकलन के दूसरे चरण में ट्रांजिट सर्वे (पारिस्थितिक सर्वेक्षण) किया जाएगा। इस दौरान हिरन, चीतल सहित अन्य शाकाहारी वन्यजीवों के स्केट (मल) के सैंपल एकत्र किए जाएंगे। इन सैंपलों को डीएनए जांच के लिए भेजा जाएगा, जिससे जंगल की पूरी खाद्य श्रृंखला को समझा जा सके।


चार चरणों में होता है बाघ आकलन

बाघ आकलन की प्रक्रिया एक तय प्रोटोकॉल के अनुसार चार चरणों में पूरी की जाती है।
पहले चरण में साइंस सर्वे, दूसरे में ट्रांजिट सर्वे, तीसरे चरण में कैमरा ट्रैप लगाए जाते हैं और अंतिम चरण में कैमरा ट्रैप से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) बाघ आकलन की अंतिम रिपोर्ट तैयार करता है।
इस बार बाघों की संख्या के साथ-साथ उनके वास स्थल और भोजन शृंखला की स्थिति का भी वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा।


वन कर्मियों को दिया गया विशेष प्रशिक्षण

बाघ संरक्षण के इस नए प्रयास के तहत वन कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसे के अनुसार, कर्मचारियों को उन वन्यजीवों—जैसे चीतल और हिरन—के स्केट सैंपल एकत्र करने की विधि सिखाई गई है, जिनका बाघ शिकार करता है। सैंपल के साथ संबंधित रेंज, बीट और लोकेशन की पूरी जानकारी भी दर्ज की जाएगी।


वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद अहम प्रयोग

भारतीय वन्यजीव संस्थान की वैज्ञानिक शिखा बिष्ट ने बताया कि यह प्रयास देश में पहली बार किया जा रहा है।
इससे यह पता चलेगा कि बाघ जिन शाकाहारी वन्यजीवों को खाता है, उनकी सेहत कैसी है और वे स्वयं किस तरह का भोजन ग्रहण करते हैं। इसके अलावा, अलग-अलग टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले हिरन और चीतल आनुवांशिक रूप से एक जैसे हैं या अलग, इसका भी वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।


वास स्थल और भोजन शृंखला संरक्षण की कुंजी

विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की संख्या बढ़ाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए मजबूत वास स्थल और संतुलित भोजन शृंखला सबसे अहम है। डीएनए आधारित यह अध्ययन भविष्य में बाघ संरक्षण नीतियों को और अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगा।


निष्कर्ष

उत्तराखंड में बाघ संरक्षण की दिशा में यह पहल एक नया अध्याय साबित हो सकती है। बाघों की गिनती से आगे बढ़कर अब पूरे पारिस्थितिक तंत्र की सेहत को समझने की कोशिश की जा रही है। यह वैज्ञानिक अध्ययन न केवल बाघों के संरक्षण में सहायक होगा, बल्कि जंगलों के संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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