देहरादून | 7 फरवरी 2026
उत्तराखंड में वर्षों से निवास कर रहे नेपाल मूल के लोगों को लेकर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। चुनाव आयोग ने साफ किया है कि एसआईआर प्रक्रिया में वही लोग शामिल किए जाएंगे, जिनके पास भारतीय नागरिकता का वैध प्रमाण होगा। नागरिकता के बिना किसी भी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाएगा।
सीमावर्ती जिलों में गहरा रिश्ता, लेकिन नियम एक
चंपावत, पिथौरागढ़ से लेकर देहरादून तक उत्तराखंड और नेपाल के बीच रोटी-बेटी का पुराना और मजबूत रिश्ता रहा है। नेपाल से विवाह कर उत्तराखंड आईं अनेक महिलाएं और दशकों से यहां रह रहे परिवार इस सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा हैं। कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके बच्चों का जन्म उत्तराखंड में ही हुआ है। ऐसे में एसआईआर को लेकर यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि इन लोगों के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
नागरिकता के बिना नहीं बनेगा वोट
अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. विजय कुमार जोगदंडे ने स्पष्ट किया कि भारत में किसी भी बाहरी देश से आए व्यक्ति के लिए मतदाता बनने की पहली शर्त भारतीय नागरिकता है। उन्होंने बताया कि जो लोग वर्तमान मतदाता सूची में शामिल हैं, उनका नाम नागरिकता के आधार पर ही दर्ज हुआ होगा। जिनके पास भारतीय नागरिकता नहीं है, उनका वोट नहीं बनाया जा सकता।
2003 के बाद नागरिक बने लोगों को देना होगा प्रमाण
डॉ. जोगदंडे ने बताया कि नेपाल मूल के वे लोग, जो भारतीय नागरिक बन चुके हैं लेकिन वर्ष 2003 में मतदाता सूची में शामिल नहीं थे, उन्हें एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नागरिकता प्रमाणपत्र और जन्मतिथि से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे। इन प्रमाणों के आधार पर ही उनका नाम मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा।
इन्म्यूरकेशन फॉर्म के साथ दस्तावेज जरूरी
चुनाव आयोग के अनुसार ऐसे मामलों में बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) की मैपिंग संभव नहीं हो पाएगी। इसके बावजूद संबंधित व्यक्ति को एसआईआर के इन्म्यूरकेशन फॉर्म के साथ आवश्यक दस्तावेज जमा करने होंगे। यदि ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद किसी नेपाली मूल के भारतीय नागरिक को नोटिस जारी किया जाता है, तो उन्हें भी नागरिकता और जन्मतिथि का प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।
निष्कर्ष
एसआईआर प्रक्रिया के तहत चुनाव आयोग ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है कि मतदाता बनने का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही मिलेगा। उत्तराखंड और नेपाल के सामाजिक रिश्ते चाहे कितने भी पुराने और मजबूत हों, लेकिन मतदाता सूची में शामिल होने के लिए नागरिकता ही अंतिम आधार होगी। इससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक शुद्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।


