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देहरादून की रातें खतरे की ओर: ‘थ्रिल’ और वायरल वीडियो की होड़ में युवा कर रहे शहर की सड़कों को रेस ट्रैक में तब्दील

तारीख: 12 नवंबर 2025
स्थान: देहरादून


रात ढलते ही दून की सड़कों पर रफ्तार और नशे का कब्जा

देहरादून की शांत रातें अब तेज रफ्तार, साइलेंसर की गूंज और स्टंट की चीख में बदल रही हैं।
जैसे ही घड़ी 11 बजाती है, राजपुर रोड, ISBT–आशारोड़ी, सहस्रधारा रोड, मसूरी डायवर्जन, चकराता रोड और रायपुर रोड पर बाइक और कारें बेलगाम दौड़ने लगती हैं।

रफ्तार और रोमांच का यह खेल न तो शहर की नींद को सोने देता है,
और न ही सड़क पर चलने वाले लोगों की सुरक्षा को।


‘थ्रिल’, ‘लाइक्स’ और इंटरनेट मीडिया की आग ने बदला युवाओं का व्यवहार

युवा सिर्फ ड्राइव नहीं कर रहे,
वे एड्रेनलिन, लाइक्स और वायरल वीडियो की तलाश में सड़कों पर ‘शो’ कर रहे हैं।
स्टंट, व्हीली, ड्रिफ्ट… और ऊपर से शराब या नशे का तड़का।

‘स्पीड किंग्स’, ‘नाइट राइडर्स’, ‘स्टंट ब्रदर्स’ जैसे ऑनलाइन ग्रुप
लोकेशन शेयर करते हैं, रात में राइड तय करते हैं और वीडियो अपलोड कर
दूसरों को “कूलनेस” का नकली सबक देते हैं।


पुलिस कार्रवाई में तेजी, मगर चुनौती मजबूत

दून पुलिस ने रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक अतिरिक्त गश्त,
मुख्य मार्गों पर बैरिकेडिंग और सीसीटीवी निगरानी बढ़ाई है।

सितंबर 2025 तक पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई:

  • 152441 चालान

  • 10475 वाहन सीज

  • शराब पीकर वाहन चलाने पर 499 कार्रवाई

  • खतरनाक ढंग से वाहन चलाने पर 393 चालान

  • ओवरस्पीडिंग पर 3145 चालान

इसके बावजूद ‘नाइट राइडिंग कल्चर’ खुलेआम जारी है।
वीकेंड की रातें तो सीधे तौर पर गैरकानूनी रेस ट्रैक में बदल जाती हैं।


देर रात होने वाली दुर्घटनाएं शहर की चिंता बढ़ा रहीं

ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, पिछले एक वर्ष में देर रात या सुबह-सुबह
150 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं।
इनमें से 70 प्रतिशत मामलों में तेज रफ्तार या नशा प्रमुख कारण रहे।

इन दुर्घटनाओं में न सिर्फ वाहन चालक, बल्कि निर्दोष राहगीर भी शिकार बने।


मनोवैज्ञानिक: यह ‘दिखावे की लत’ है, सिर्फ रोमांच नहीं

मनोचिकित्सक डॉ. स्वाति मिश्रा कहती हैं कि
युवाओं का यह व्यवहार ‘थ्रिल’ से कहीं आगे बढ़ चुका है।

यह अब आत्म-प्रदर्शन की आदत,
इंटरनेट मीडिया की रेस
और सामाजिक मान्यता की चाह बन चुका है।

यह प्रवृत्ति नशे और दबाव के साथ मिलकर
एक खतरनाक मानसिकता तैयार कर रही है।


विशेषज्ञों की राय: सिर्फ चालान नहीं, युवाओं के लिए सुरक्षित विकल्प जरूरी

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ देवेंद्र शाह का कहना है:
“समस्या चालान से नहीं रुकेगी।
स्कूल–कॉलेजों में सड़क सुरक्षा क्लब,
युवाओं के लिए एडवेंचर स्पोर्ट्स और
काउंसलिंग अनिवार्य करनी होगी।”

उनका मानना है कि
यह समाज, विद्यालय और परिवार—तीनों की साझा जिम्मेदारी है।


शिक्षा विशेषज्ञ का सुझाव: दिशा सही दें, सिर्फ डर नहीं

दून विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. सुरेखा डंगवाल कहती हैं कि
“रफ्तार का रोमांच युवाओं में स्वाभाविक है।
जरूरत इसे सुरक्षित रास्ते पर मोड़ने की है।”

उनके अनुसार,
रेसिंग ट्रैक, ऑफ-रोड पार्क और एडवेंचर ज़ोन विकसित किए जाएं,
जहां युवा अपनी ऊर्जा को सुरक्षित तरीके से व्यक्त कर सकें।


निष्कर्ष: दून की रातों को बचाने के लिए अदालत, प्रशासन, परिवार और समाज—सभी की साझी जिम्मेदारी

देहरादून की रातें आज दो राहों पर खड़ी हैं।
एक ओर आकर्षक, शांत और खूबसूरत दून
और दूसरी ओर
तेज रफ्तार, नशे और दिखावे की अंधेरी लत।

जुर्माना, गश्त और गिरफ्तारी जरूरी हैं,
लेकिन असली बदलाव
तभी आएगा जब
परिवार, स्कूल, कॉलेज और समाज
युवाओं को सही दिशा देंगे।

अगर यह चलन नहीं रुका,
तो दून की रातें रोमांच नहीं,
खतरा और हादसों की परछाई बन जाएंगी।

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