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देहरादून में गैंगस्टर मर्डर की परतें खुलीं: विक्रम शर्मा हत्याकांड में पुरानी रंजिशें बनीं पहेली, शूटरों को मिला बहुराज्यीय सपोर्ट

देहरादून | उत्तराखंड | तिथि: फरवरी 2026

झारखंड के कुख्यात गैंगस्टर विक्रम शर्मा की देहरादून में हुई हत्या की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, यह मामला एक सस्पेंस थ्रिलर की तरह उलझता जा रहा है। पुलिस जांच में सामने आया है कि हत्या की साजिश बेहद योजनाबद्ध थी और इसके पीछे कई दुश्मनों के साथ-साथ शूटरों का एक संगठित नेटवर्क भी सक्रिय था।


पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले तीनों शूटर अलग-अलग साधनों से हरिद्वार पहुंचे थे। वहां पहले से तय योजना के तहत तीनों एक स्थान पर मिले और फिर देहरादून आकर वारदात को अंजाम दिया। घटना के बाद वे कुछ दूरी तक एक साथ भागे, लेकिन हरिद्वार से आगे अलग-अलग रास्तों और साधनों से फरार हो गए, ताकि पुलिस को गुमराह किया जा सके।


जांच में सामने आए कई दुश्मन

जैसे-जैसे पुलिस गहराई से जांच कर रही है, वैसे-वैसे विक्रम शर्मा के कई पुराने दुश्मनों के नाम सामने आ रहे हैं। झारखंड से लेकर उत्तराखंड तक शूटरों को ठहराने, आने-जाने और संसाधन उपलब्ध कराने में कई मददगारों की भूमिका उजागर हुई है। इन्हीं कड़ियों ने हत्याकांड की गुत्थी को और जटिल बना दिया है।


जरायम की दुनिया का बड़ा नाम था विक्रम

बताया जा रहा है कि विक्रम शर्मा झारखंड की अपराध की दुनिया में एक समय बड़ा नाम था। उसके खिलाफ हत्या, रंगदारी और संगठित अपराध से जुड़े 50 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे। उसने अपने खास चेले अखिलेश सिंह को डॉन के रूप में स्थापित करने की कोशिश में भी कई लोगों से दुश्मनी मोल ली थी।


रिकॉर्ड के अनुसार, विक्रम पर वर्ष 2007 में साकची आम बागान के पास श्री लेदर के मालिक आशीष डे की हत्या और 4 अक्टूबर 2008 को बिष्टुपुर इलाके में टाटा स्टील के सुरक्षा अधिकारी जयराम सिंह की हत्या जैसे कई हाई-प्रोफाइल मामलों के गंभीर आरोप रहे हैं।


ताकत के दम पर बनाया नेटवर्क

पुलिस का कहना है कि विक्रम जिस व्यक्ति या समूह में उसे फायदा दिखता था, उसे अपने पाले में लाने की कोशिश करता था। अपना दबदबा कायम रखने के लिए वह पुलिस और नेताओं से भी संबंध साधे रहता था। उसके गिरोह के गुर्गे अपराध करते थे और मामलों को उसके विरोधियों की ओर मोड़ने का प्रयास किया जाता था।


इसी आपराधिक गतिविधियों के चलते उसकी ददई यादव और बड़ा निजाम जैसे कुख्यात गिरोहों से तीखी रंजिश हुई। बाद में ददई यादव और बड़ा निजाम की मौत हो गई। हाल के समय में गणेश सिंह के साथ भी उसकी दुश्मनी की चर्चाएं जोरों पर थीं।


निष्कर्ष:
विक्रम शर्मा की हत्या महज एक अपराध नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही गैंगवार, वर्चस्व की लड़ाई और पुरानी रंजिशों का परिणाम प्रतीत हो रही है। शूटरों को मिले बहुराज्यीय सहयोग और कई संभावित दुश्मनों की मौजूदगी ने पुलिस जांच को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अब जांच एजेंसियों के सामने असली साजिशकर्ता तक पहुंचना और पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करना सबसे बड़ी चुनौती है।

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