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देहरादून में गैस संकट का असर—बदला स्ट्रीट फूड का स्वाद, महंगे हुए परांठे; राजमा-चावल बने लोगों का सहारा

देहरादून | 25 मार्च 2026

देहरादून में रसोई गैस संकट का असर अब आम लोगों की थाली तक साफ दिखाई देने लगा है। शहर के स्ट्रीट फूड का स्वाद, मेन्यू और कीमत—तीनों में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पहले ठेलियों पर परांठे और छोले-भटूरे की भरमार रहती थी, वहीं अब राजमा-चावल और कढ़ी-चावल जैसे व्यंजन प्रमुख रूप से नजर आ रहे हैं।

गैस सिलिंडर की बढ़ती कीमत और आपूर्ति में अनिश्चितता ने छोटे खाद्य कारोबारियों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ रहा है। शहर के प्रमुख बाजारों और दफ्तरों के आसपास अब सस्ता और भरपेट खाना मिलना मुश्किल होता जा रहा है।

कीमतों में आई तेजी ने लोगों को चौंका दिया है। जो आलू या प्याज का परांठा पहले 20 रुपये में मिल जाता था, अब उसकी कीमत 30 से 35 रुपये तक पहुंच गई है। वहीं, छोले-भटूरे जो पहले 40-50 रुपये में उपलब्ध थे, अब 70-75 रुपये में बिक रहे हैं। कई ठेलियों पर पूरी-सब्जी भी सीमित कर दी गई है।

प्रेमनगर क्षेत्र के ठेली संचालक रामवीर बताते हैं कि लगातार गैस पर तवा और कड़ाही चलाना अब घाटे का सौदा बन गया है। एक सिलिंडर जल्दी खत्म हो जाता है और समय पर नया सिलिंडर मिलना भी चुनौती बन गया है। ऐसे में वे अब ऐसे व्यंजन बना रहे हैं, जिन्हें एक बार पकाकर लंबे समय तक धीमी आंच पर रखा जा सके।

इसी कारण राजमा-चावल, कढ़ी-चावल और दाल-चावल जैसे व्यंजनों की मांग तेजी से बढ़ी है। ये कम गैस में तैयार होकर ज्यादा देर तक परोसे जा सकते हैं, जिससे लागत नियंत्रित रहती है। राहगीरों, छात्रों और दफ्तर जाने वाले लोगों के बीच ये विकल्प अब तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

तवे से तंदूर तक बदला ट्रेंड
गैस की खपत कम करने के लिए कई ठेली संचालकों ने तवे की जगह छोटे तंदूर का सहारा लेना शुरू कर दिया है। तंदूर में एक साथ कई परांठे तैयार हो जाते हैं, जिससे समय और गैस दोनों की बचत होती है। तंदूरी परांठा और तंदूरी रोटी अब नए विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।

कोयले की अंगीठी की वापसी
कुछ कारोबारी गैस के विकल्प के रूप में कोयले की अंगीठी का उपयोग कर रहे हैं। सुबह एक बार अंगीठी जलाने के बाद कई घंटे तक भोजन गर्म रखा जा सकता है। हालांकि इससे धुआं और समय दोनों बढ़ते हैं, लेकिन गैस की बचत के लिए यह तरीका अपनाया जा रहा है।

आमजन पर बढ़ा आर्थिक बोझ
गैस संकट का सबसे ज्यादा असर छात्रों, दिहाड़ी मजदूरों और कम आय वर्ग के लोगों पर पड़ा है। पहले जहां 50 रुपये में नाश्ता और चाय आसानी से हो जाती थी, अब उतने में केवल एक प्लेट भोजन ही मिल पा रहा है। रोजाना खाने के बजट में 20 से 30 रुपये तक की बढ़ोतरी हो गई है।

बाजार में नए दाम

  • आलू/प्याज परांठा: 20 रुपये से बढ़कर 30-35 रुपये
  • छोले-भटूरे: 40-50 रुपये से बढ़कर 70-75 रुपये
  • पूरी-सब्जी: कई जगह सीमित
  • राजमा-चावल/कढ़ी-चावल: मांग में तेजी
  • तंदूरी परांठा: नया विकल्प

निष्कर्ष:
देहरादून में गैस संकट ने स्ट्रीट फूड के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है। जहां एक ओर ठेली संचालक लागत बचाने के लिए नए विकल्प अपना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ता जा रहा है। यदि जल्द ही गैस आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो आने वाले समय में खाद्य पदार्थों की कीमतों में और बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।

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