बुनियादी ढांचे की बदहाली उजागर, शिक्षकों की भी भारी कमी
देहरादून, 31 जुलाई 2025
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक सरकारी स्कूल की हालत ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी सच्चाई उजागर कर दी है। घनघोर बारिश के मौसम में स्कूल की छत से प्लास्टर टूटकर गिर रहा है, फर्श पर पानी भर रहा है और दीवारों में दरारें गवाही दे रही हैं कि बच्चों की जान पढ़ाई के साथ रोजाना खतरे में पड़ रही है।
राजकीय प्राथमिक विद्यालय बापूनगर जाखन, जो समग्र शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2009 में बना था, आज जर्जर स्थिति में है। घंटाघर से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्कूल वर्तमान में 80 छात्रों की पढ़ाई की जिम्मेदारी संभाल रहा है, लेकिन उसके बुनियादी ढांचे की हालत बेहद चिंताजनक है। स्कूल की छत में दरारें हैं, दीवारें कमजोर हो चुकी हैं, और बारिश के दौरान पानी टपकना आम बात हो गई है। सबसे खराब स्थिति उस कमरे की है जहां कक्षा तीन और चार के बच्चों को एक साथ बैठाया जाता है।
बरामदे में चल रही पहली कक्षा, सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं
प्रधानाध्यापिका सीमा नेगी ने बताया कि बरसात के मौसम में छात्रों को कक्षाओं से हटाकर बरामदे में बैठाया जाता है, लेकिन वह भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। दूसरी ओर, कक्षा पांच के छात्रों को भी सीलन भरे कमरे में पढ़ाया जा रहा है। पहली कक्षा की पढ़ाई तो स्कूल के खुले बरामदे में ही संचालित की जा रही है।
बिना बाउंड्री के स्कूल, अतिक्रमण की मार
विद्यालय में चारदीवारी तक नहीं है, जिससे सुरक्षा का संकट बना हुआ है। प्रधानाध्यापिका के अनुसार, कुछ लोगों ने स्कूल की भूमि पर अतिक्रमण करने की कोशिश की और बाउंड्रीवाल तोड़ दी। छुट्टियों में कोई भूमि पर कब्जा न कर ले, इसके लिए उन्हें लगातार स्कूल का चक्कर लगाना पड़ता है।
शिक्षक भी कम, जिम्मेदारी ज्यादा
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 के अनुसार, 80 छात्रों वाले स्कूल में कम से कम तीन शिक्षक होने चाहिए, लेकिन यहां सिर्फ दो शिक्षिकाएं कार्यरत हैं। यदि किसी कारणवश एक शिक्षिका छुट्टी पर जाती हैं, तो दूसरी को अकेले पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।
निर्माण को लेकर प्रशासन हरकत में, लेकिन अभी भी इंतजार बाकी
सीईओ विनोद कुमार ढौंडियाल के अनुसार, ग्रामीण निर्माण विभाग ने स्कूल के पुनर्निर्माण के लिए ₹36.87 लाख का प्रस्ताव भेजा है। इसकी स्वीकृति के लिए लघु सिंचाई विभाग को पत्र भेजा गया है। इसके अलावा अन्य स्कूलों – जैसे तुनवाला-2, आराघर-2, धर्मपुर और सहसपुर में मरम्मत कार्य भी प्रस्तावित हैं।
अन्य स्कूल भी खस्ताहाल, कहीं प्लास्टर गिर रहा तो कहीं बाउंड्री नहीं
- दार्मिगाड चकराता के जूनियर हाईस्कूल की छत का प्लास्टर भी गिर रहा है।
- डोईवाला क्षेत्र के स्कूलों में बाउंड्री न होने से आवारा पशु और कीड़े-मकोड़ों का खतरा बना रहता है।
- झड़ौंद और सिमलास जैसे स्कूलों में कूड़े के ढेर और सुरक्षा की कमी शिक्षा की गरिमा को चुनौती दे रहे हैं।
27 स्कूलों को किया गया शिफ्ट
जिला शिक्षा अधिकारी (बेसिक) प्रेमलाल भारती ने बताया कि देहरादून जिले में 27 स्कूलों को खतरनाक स्थिति में पाकर पंचायत भवन या निजी इमारतों में स्थानांतरित किया गया है।
सरकार की मंशा और जमीनी हकीकत में फासला
शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने बताया कि सभी स्कूलों का सुरक्षा ऑडिट कराया जा रहा है। जर्जर भवनों में छात्रों को न बैठाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें दूसरी जगह स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि ₹30 करोड़ की राशि आपदा मद से जारी की गई है ताकि स्कूलों की तात्कालिक मरम्मत की जा सके।
निष्कर्ष:
राजधानी देहरादून में स्कूलों की हालत न सिर्फ प्रशासन की लापरवाही का नमूना है, बल्कि बच्चों के भविष्य और जान के साथ किया जा रहा खिलवाड़ भी है। शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों में सुरक्षित है, जमीनी स्तर पर उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी अब सिस्टम की है – जिसे जागने की जरूरत है।


