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नंदा राजजात पर नया मोड़: 2026 में होगी “मां नंदा की बड़ी जात”, परंपरा के नाम पर शुरू हुई बहस

महापंचायत में फैसला, कुरुड़ मंदिर समिति ने संभाली आयोजन की कमान


चमोली | उत्तराखंड
दिनांक: 27 जनवरी 2026


हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा की पवित्र यात्रा को लेकर इस वर्ष एक नया अध्याय जुड़ गया है। सोमवार को नंदानगर विकास खंड सभागार में आयोजित हुई महापंचायत में यह निर्णय लिया गया कि वर्ष 2026 में मां नंदा की “बड़ी जात” आयोजित की जाएगी। यह पहला अवसर है जब पारंपरिक रूप से जानी जाने वाली नंदा राजजात को “बड़ी जात” का नाम देकर आयोजन करने का निर्णय लिया गया है, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।


महापंचायत सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक चली, जिसमें क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, मंदिर समितियां, हक-हकूकधारी और बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। बैठक में यह भी तय हुआ कि आगामी 23 जनवरी 2026, वसंत पंचमी के दिन, कुरुड़ स्थित मां नंदा के सिद्धपीठ मंदिर में बड़ी जात के शुभारंभ का मुहूर्त निकाला जाएगा।


दरअसल, मां नंदा की लोकजात हर वर्ष आयोजित होती है, जबकि आदिकाल से चली आ रही 12 वर्षीय परंपरा वाली यात्रा को नंदा राजजात कहा जाता है। लेकिन इस बार सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर समिति और नंदा राजजात समिति नौटी के बीच सहमति न बनने के चलते राजजात के नाम को बदलकर इसे “बड़ी जात” कहे जाने का निर्णय लिया गया। इस बड़ी जात का नेतृत्व कुरुड़ मंदिर समिति कर रही है, जिसमें बधाण, दशोली, लाता और बंड क्षेत्र के हक-हकूकधारी शामिल होंगे।


इतिहास पर नजर डालें तो मां नंदा की जात 12 वर्षों में आयोजित करने की मान्यता रही है, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं और अन्य कारणों से इसका समय बदलता रहा है। वर्ष 2012 में प्रस्तावित राजजात किसी कारणवश नहीं हो सकी, जिसे 2013 के लिए टाल दिया गया। हालांकि 2013 की आपदा के कारण जात फिर स्थगित हो गई और अंततः 2014 में राजजात का आयोजन हुआ।


इस बार भी 12 वर्ष पूर्ण होने पर 2026 में राजजात प्रस्तावित थी, लेकिन नंदा राजजात समिति नौटी ने अगस्त-सितंबर में यात्रा को जोखिम भरा बताते हुए और मलमास (अधिक मास) का हवाला देते हुए इसे 2027 तक स्थगित करने का निर्णय लिया। इसी फैसले पर नंदा देवी मंदिर समिति कुरुड़ ने कड़ा विरोध जताया।


महापंचायत के बाद आयोजन समिति अध्यक्ष हरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि पिछले आठ महीनों से शासन और प्रशासन से बड़ी जात के आयोजन को लेकर गुहार लगाई जा रही थी, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि राजजात समिति ने बिना कुरुड़ समिति की सहमति के एकतरफा रूप से यात्रा स्थगित करने की घोषणा कर दी। इसके बाद मजबूरी में राजजात के स्थान पर “मां नंदा की बड़ी जात” आयोजित करने का निर्णय लिया गया।


महापंचायत के समापन के बाद कुरुड़ स्थित मां नंदा के सिद्धपीठ मंदिर में विशेष पूजाएं आयोजित की गईं। बड़ी जात समिति अध्यक्ष हरेंद्र सिंह रावत और मंदिर समिति अध्यक्ष सुखवीर रौतेला के नेतृत्व में हुए इन अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। थोकदार वीरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि मां नंदा लोक आस्था की प्रतीक हैं और इस अनुष्ठान में आने वाली हर चुनौती का सामना करने के लिए श्रद्धालु तैयार हैं।


निष्कर्ष:

मां नंदा की जात को “बड़ी जात” का नाम दिए जाने से जहां एक ओर 2026 में यात्रा आयोजन का मार्ग प्रशस्त हुआ है, वहीं दूसरी ओर परंपरा, अधिकार और नामकरण को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है। अब यह देखना अहम होगा कि यह निर्णय श्रद्धा और परंपरा के संतुलन को किस दिशा में ले जाता है और आने वाले समय में इस ऐतिहासिक यात्रा का स्वरूप कैसा होता है।

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