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हरिद्वार लैंड स्कैम: चार्जशीट पर अब तक सस्पेंस बरकरार

सस्पेंड किए गए अधिकारियों को एक माह बाद भी नहीं सौंपी गई चार्जशीट, सीएम के निर्देश पर जांच जारी

स्थान: देहरादून/हरिद्वार


क्या है पूरा मामला?

हरिद्वार नगर निगम की ओर से सराय क्षेत्र की 33 बीघा कृषि भूमि को व्यावसायिक श्रेणी में दिखाकर सर्किल रेट बढ़ा दिया गया, जिससे उस ज़मीन की कीमतों में 5 गुना तक इज़ाफा हुआ।

  • इसी दर पर तीन किसानों से लगभग ₹54 करोड़ में भूमि खरीदी गई
  • बाद में सामने आया कि बाजार भाव इससे काफी कम था।

आरोप: जानबूझकर भूमि का उपयोग बदलकर सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया गया।


कौन-कौन हैं आरोपी?

राज्य सरकार ने 3 जून 2025 को तीन वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित किया था:

अधिकारी का नामपदस्थिति
कर्मेंद सिंहतत्कालीन जिलाधिकारीनिलंबित
वरुण चौधरीनगर आयुक्त (IAS)निलंबित
अजयवीर सिंहएडीएम (PCS)निलंबित

चार्जशीट का क्या हुआ?

  • विभागीय चार्जशीट तैयार हो चुकी है, लेकिन अभी तक उच्च स्तरीय अनुमोदन लंबित है।
  • चार्जशीट के अनुमोदन के बाद ही इन्हें आधिकारिक रूप से आरोप पत्र सौंपा जाएगा।
  • इसके बाद अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा और फिर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

सचिव गृह शैलेश बगौली ने पुष्टि की:
“चार्जशीट अनुमोदन के लिए उच्च स्तर पर भेजी गई है। जल्द ही आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।”


विजिलेंस जांच – सीएम धामी के निर्देश पर जारी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्पष्ट निर्देशों के बाद विजिलेंस जांच चल रही है, जिसमें भूमि खरीद में धांधली और सर्किल रेट में हेराफेरी की गहन पड़ताल की जा रही है।
जांच के तहत, दस्तावेजों की ऑडिट, जमीन के मौजूदा रेट की तुलना और अधिकारियों की भूमिका की गहराई से जांच हो रही है।


भूपेंद्र कुमार केस – फैसला लंबित

परिवहन निगम के डीजीएम (वित्त) भूपेंद्र कुमार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में विजिलेंस जांच पूरी हो चुकी है।

  • विजिलेंस ने शासन से मुकदमा दर्ज करने की अनुमति मांगी है
  • लेकिन अब तक कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं किया गया है

यह मामला मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता वाली बैठक में उठाया गया, पर निर्णय लंबित है।


प्रशासन पर सवाल

  • एक माह से अधिक समय बीतने के बावजूद चार्जशीट की प्रक्रिया अधूरी क्यों?
  • क्या उच्च स्तर पर फाइलें अटकाना प्रशासनिक शिथिलता का संकेत है?
  • क्या इससे जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल नहीं खड़े होते?

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