देहरादून | 6 फरवरी 2026
देहरादून।
मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के लिए जहां ज्ञान और मनोरंजन का साधन बने, वहीं अत्यधिक इस्तेमाल अब गंभीर मानसिक खतरे की शक्ल लेता जा रहा है। हाल ही में गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम की लत के चलते तीन मासूम बहनों की मौत की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक हादसे के बाद बच्चों में फोन और ऑनलाइन गेम की बढ़ती लत को लेकर अभिभावकों, शिक्षकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता और गहरी हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित कर रहा है। बच्चे किताबों, खेल मैदानों और दोस्तों के साथ समय बिताने के बजाय मोबाइल की स्क्रीन में सिमटते जा रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग की लत उन्हें धीरे-धीरे मानसिक रूप से असंतुलित बना रही है, जिसका असर उनके व्यवहार और सोच पर साफ दिखाई देने लगा है।
चिड़चिड़ापन, गुस्सा और एकाग्रता में गिरावट
काउंसलरों के अनुसार, मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में चिड़चिड़ापन, जिद, आक्रामकता और मानसिक असंतुलन बढ़ रहा है। उनकी एकाग्रता कम हो रही है और गुस्सा जल्दी फूट पड़ता है। कई बच्चे मोबाइल पाने के लिए बेचैन रहते हैं, रोते हैं और माता-पिता पर दबाव बनाने लगते हैं।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकोमेट्रिक काउंसलिंग के अध्यक्ष डॉ. मुकुल शर्मा बताते हैं कि बच्चों की असली संपत्ति उनका भविष्य है, लेकिन अभिभावक अनजाने में उन्हें मोबाइल के हवाले कर रहे हैं। माता-पिता का बच्चों से भावनात्मक दूरी बनाना और उन पर समय-समय पर नजर न रखना उन्हें मानसिक रूप से कमजोर कर देता है। बच्चों के पहले और सबसे बड़े काउंसलर उनके माता-पिता ही होते हैं। जब यह रिश्ता कमजोर पड़ता है, तो बच्चे इंटरनेट मीडिया और ऑनलाइन गेम्स की दुनिया में खो जाते हैं।
अकेलापन बढ़ा रहा है ऑनलाइन गेमिंग की लत
न्यूरो साइकोलॉजिस्ट एवं सीबीएसई काउंसलर डॉ. सोना कौशल गुप्ता के अनुसार, कई बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं, उनका कोई लक्ष्य नहीं रहता और वे दोस्तों से मिलना या खेलना भी पसंद नहीं करते। ऐसे बच्चे धीरे-धीरे समाज से कटकर अकेलेपन में जीने लगते हैं। घर में उन्हें भावनात्मक सहारा मोबाइल से ही मिलने लगता है, जिससे ऑनलाइन गेमिंग की लत और गहरी हो जाती है।
डॉ. गुप्ता बताती हैं कि ऑनलाइन गेम्स में एक स्तर से दूसरे स्तर तक पहुंचने की दौड़ में बच्चे इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें यह अहसास ही नहीं रहता कि मोबाइल के बाहर भी एक वास्तविक दुनिया है। यही स्थिति आगे चलकर मानसिक और सामाजिक नुकसान का कारण बनती है।
बच्चों को मोबाइल की लत से बचाने के लिए इन बातों पर दें ध्यान
- बच्चों के सामने मोबाइल का इस्तेमाल न्यूनतम रखें, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं।
- दो से तीन वर्ष की आयु तक बच्चों को पूरी तरह स्क्रीन से दूर रखें।
- माता-पिता बच्चों के साथ दोस्त की तरह व्यवहार करें, ताकि वे बिना डर के अपनी बात साझा कर सकें।
- बच्चों को संस्कार, सभ्यता और संस्कृति से जोड़ें, जिससे उनका नैतिक विकास हो सके।
- बच्चों के साथ समय बिताएं और भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करें।
- इस बात पर नजर रखें कि बच्चा कितनी देर मोबाइल चला रहा है और किस तरह की सामग्री देख रहा है।
निष्कर्ष
ऑनलाइन गेम और मोबाइल का अनियंत्रित इस्तेमाल बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है कि यदि समय रहते अभिभावकों ने बच्चों की स्क्रीन आदतों पर नियंत्रण नहीं किया, तो इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं। बच्चों को सुरक्षित, संतुलित और स्वस्थ भविष्य देने के लिए माता-पिता का जागरूक और सक्रिय होना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।


