दिनांक: 11 फरवरी 2026
स्थान: उत्तराखंड (गढ़वाल–कुमाऊं क्षेत्र)
उत्तराखंड में इस सर्दी भालुओं की शीत निद्रा बाधित होने से हालात चिंताजनक बनते जा रहे हैं। सामान्यतः सर्दियों में गहरी बर्फबारी के बाद शीत निद्रा में चले जाने वाले भालू इस बार सक्रिय बने हुए हैं। परिणामस्वरूप वे भोजन की तलाश में जंगलों से निकलकर आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। जनवरी से अब तक राज्य में भालू के हमलों की नौ घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे लोगों में भय और वन विभाग की चिंता दोनों बढ़ गई हैं।
नींद में खलल, आक्रामक हुए भालू
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष सर्दियों में न तो पर्याप्त ठंड पड़ी और न ही उतनी बर्फबारी हुई, जितनी भालुओं के शीत निद्रा में जाने के लिए आवश्यक होती है। शीत निद्रा पूरी न होने के कारण भालू चिड़चिड़े और आक्रामक व्यवहार के साथ सक्रिय हैं। यही वजह है कि वे इंसानी बस्तियों के पास अधिक दिखाई दे रहे हैं और हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं।
बर्फबारी की कमी बनी मुख्य वजह
भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सत्य कुमार का कहना है कि भालुओं को शीत निद्रा में जाने के लिए कम से कम 2500 मीटर की ऊंचाई पर तीन महीने तक लगभग एक फीट मोटी बर्फ जमी रहनी चाहिए। लेकिन इस बार अक्तूबर के बाद से न तो पर्याप्त बारिश हुई और न ही बर्फबारी, जिससे भालू शीत निद्रा में नहीं जा पाए।
ग्लेशियर से भी जुड़ा है संकट
वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक पंकज चौहान बताते हैं कि वे पिछले डेढ़ दशक से पिंडारी बेसिन में ग्लेशियरों का अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार ग्लेशियरों की सेहत के लिए दिसंबर से जनवरी के बीच पांच से छह बार नियमित बर्फबारी आवश्यक होती है, जो पिछले एक दशक से नहीं हो पा रही। जो बर्फ गिरती भी है, वह प्री-समर में होती है और तेजी से पिघल जाती है, जिससे पारिस्थितिकी संतुलन प्रभावित हो रहा है।
वन विभाग अलर्ट मोड में
गढ़वाल वृत्त के वन संरक्षक आकाश वर्मा ने बताया कि कुछ क्षेत्रों में भालू अत्यधिक सक्रिय हैं और भोजन की तलाश में आबादी के करीब आ रहे हैं। कम बर्फबारी इसकी प्रमुख वजह है। इन संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।
पिछले साल के आंकड़े भी डराने वाले
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष राज्य में भालू के हमलों की 116 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इनमें आठ लोगों की मौत हुई थी, जबकि 108 लोग घायल हुए थे। इस साल की शुरुआत में ही नौ घटनाएं सामने आना भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में बदलते मौसम और कम बर्फबारी का असर अब सीधे मानव-वन्यजीव संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है। भालुओं की शीत निद्रा में खलल न केवल उनके स्वभाव को आक्रामक बना रहा है, बल्कि लोगों की जान-माल के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस प्रभाव से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीति, वैज्ञानिक प्रबंधन और जन-जागरूकता बेहद जरूरी है, ताकि इंसान और वन्यजीवों के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।


