देहरादून | दिनांक: 12 फरवरी 2026
पहाड़ों की शांत वादियों में बसा देहरादून, जिसे कभी सुकून, अनुशासन और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था, आज तेजी से बदलती आपराधिक तस्वीर से जूझ रहा है। शहर में लगातार सामने आ रही हत्याओं और हिंसक घटनाओं ने न सिर्फ आम लोगों को भयभीत किया है, बल्कि दून की वर्षों पुरानी छवि पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
दिनदहाड़े वारदातें, कानून का घटता भय
भरे बाजार में गोली चलना, सार्वजनिक सड़कों पर धारदार हथियारों से हमले और रिहायशी इलाकों में हत्याएं—अब ये घटनाएं अपवाद नहीं रहीं। अपराधियों का दुस्साहस इस कदर बढ़ चुका है कि वे भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी वारदात को अंजाम देने से नहीं हिचक रहे। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि कानून का डर कमजोर पड़ता जा रहा है।
संपत्ति ने रिश्तों को बनाया दुश्मन
देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में जमीनों के बढ़ते दामों ने संपत्ति को विवाद का सबसे बड़ा कारण बना दिया है। पारिवारिक संपत्तियों के बंटवारे, कब्जे और करोड़ों रुपये के सौदों को लेकर तनाव अब अदालतों से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुका है। हालिया अर्जुन शर्मा हत्याकांड में भी संपत्ति और आर्थिक लेन-देन का एंगल सामने आया, जहां मां-बेटे के बीच अदालत तक मामला पहुंचा और रिश्ते पूरी तरह टूट गए।
लेन-देन में अविश्वास, हिंसा में बदलता आक्रोश
कारोबारी और निजी लेन-देन में बढ़ता अविश्वास भी हत्या जैसी घटनाओं को जन्म दे रहा है। उधारी, निवेश और साझेदारी में हुए विवादों में बातचीत और समझौते की जगह हथियारों ने ले ली है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा, दिखावे की दौड़ और त्वरित सफलता की चाह ने मानसिक तनाव को बढ़ा दिया है, जिसका नतीजा कई बार हिंसक रूप में सामने आता है।
प्रेम प्रसंग और आवेश में लिया गया फैसला
शहर में प्रेम प्रसंगों से जुड़ी हिंसा भी चिंता का विषय बनती जा रही है। अस्वीकृति, शक, सामाजिक दबाव और टूटते रिश्ते युवाओं को अंधे गुस्से की ओर धकेल रहे हैं। हाल ही में सामने आया गुंजन हत्याकांड इस बात का उदाहरण है कि एक पल का आवेश किस तरह किसी की जिंदगी छीन सकता है।
सार्वजनिक स्थान भी नहीं रहे सुरक्षित
बाजार, सड़क, पार्क, रेस्टोरेंट और यहां तक कि खेल मैदानों के आसपास भी वारदातें होने लगी हैं। सीसीटीवी कैमरे, पुलिस चेकिंग और सर्विलांस के बावजूद अपराधियों के हौसले कम नहीं हो रहे। आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और शहर में भय का माहौल गहराता जा रहा है।
बदलती जीवनशैली और सामाजिक तनाव
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि तेजी से बदलती जीवनशैली, पारिवारिक विघटन और संवाद की कमी भी हिंसा को बढ़ावा दे रही है। पहले विवाद परिवार या समाज के बुजुर्ग सुलझा देते थे, अब सीधे एफआईआर और प्रतिशोध का रास्ता चुना जा रहा है। सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति ने ‘इगो क्लैश’ को और हवा दी है, जिससे छोटी बातें भी बड़े टकराव में बदल जाती हैं।
पुलिस के सामने बढ़ती चुनौती
बीते कुछ महीनों में हुई हत्या की घटनाओं ने पुलिस की चिंता बढ़ा दी है। गैस एजेंसी संचालक अर्जुन शर्मा की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या और मछली बाजार में गुंजन नामक युवती की गला काटकर हत्या ने दून को दहला दिया। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इस वर्ष हुई अधिकांश हत्याओं के पीछे संपत्ति विवाद, लेन-देन, पारिवारिक रंजिश और पुरानी दुश्मनी जैसे कारण सामने आए हैं।
निष्कर्ष
देहरादून में बढ़ती हिंसा यह चेतावनी है कि यदि समाज में संवाद, संयम और कानून का सम्मान कमजोर पड़ा, तो परिणाम और भयावह हो सकते हैं। अपराध पर नियंत्रण के लिए केवल पुलिस कार्रवाई ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, पारिवारिक संवाद और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है। तभी दून एक बार फिर शांति और सुरक्षा की पहचान को वापस पा सकेगा।


