स्थान: देहरादून, उत्तराखंड
तारीख: 3 अप्रैल 2026
उत्तराखंड में डिप्लोमा इंजीनियरों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने अब व्यापक असर दिखाना शुरू कर दिया है। राज्य सरकार की ओर से एस्मा (आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम) लागू करने की चेतावनी के बावजूद आंदोलन जारी है और अब यह पहले से अधिक आक्रामक रूप ले चुका है।
उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ के बैनर तले चल रहे इस आंदोलन में प्रदेशभर के करीब चार हजार इंजीनियर शामिल हैं, जो 27 सूत्रीय मांगों को लेकर कार्यबहिष्कार कर रहे हैं। गुरुवार को भी इंजीनियरों ने अपने-अपने विभागों में काम बंद रखा, जिससे विकास योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।
देहरादून स्थित लोक निर्माण विभाग मुख्यालय में आयोजित धरने में विभिन्न विभागों के अभियंताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि जब तक उनकी मांगों पर शासन स्तर पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक हड़ताल जारी रहेगी।
महासंघ ने आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए तकनीकी और फील्ड कार्यों को पूरी तरह प्रभावित करने की रणनीति अपनाई है। इसका सीधा असर राज्य की प्रमुख परियोजनाओं पर देखने को मिल रहा है। चारधाम यात्रा से जुड़ी सड़क और पुल निर्माण, जमरानी और सौंग बांध परियोजनाएं, सीवर लाइन विस्तार, डामरीकरण और राज्य व जिला योजना के कार्य धीमे पड़ गए हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत भी निर्माण कार्यों की गति प्रभावित हुई है।
इसके अलावा, कुंभ मेला 2027 की तैयारियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट भी दबाव में आ गए हैं। सचिवालय, सिंचाई विभाग, पेयजल निगम और अन्य तकनीकी इकाइयों में कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ गई है, जिससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है।
महासंघ का कहना है कि अभियंताओं की अनुपस्थिति में निर्माण कार्यों की तकनीकी निगरानी संभव नहीं है। इससे गुणवत्ता परीक्षण, मापन और भुगतान जैसी प्रक्रियाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। उन्होंने साफ किया है कि हड़ताल के दौरान बिना अभियंता की उपस्थिति में किए गए कार्यों का न तो मापन किया जाएगा और न ही भुगतान।
शहरी क्षेत्रों में भी इसका असर स्पष्ट दिख रहा है। एमडीडीए और एचआरडीए के अंतर्गत भवन मानचित्र स्वीकृति, अवैध निर्माणों की जांच, निरीक्षण और अन्य विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं, जिससे कई महत्वपूर्ण फैसले लंबित पड़े हैं।
अब इस आंदोलन का प्रभाव आवश्यक सेवाओं तक भी पहुंच गया है। पेयजल आपूर्ति, ऊर्जा उत्पादन और जल प्रबंधन पर दबाव बढ़ गया है। सिंचाई विभाग में नहरों की सफाई, बाढ़ नियंत्रण, मरम्मत और जल प्रवाह से जुड़े कार्य बाधित हो रहे हैं, जिससे आने वाले समय में और समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
इस आंदोलन को कई कर्मचारी संगठनों का समर्थन भी मिल चुका है, जिनमें अधिकारी-कर्मचारी-शिक्षक समन्वय समिति, सिंचाई कर्मचारी महासंघ, सचिवालय संघ और लोक निर्माण विभाग के कर्मचारी संगठन शामिल हैं। इन संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन और व्यापक हो सकता है।
सबसे अधिक असर चारधाम मार्गों की मरम्मत, बांध परियोजनाओं, ग्रामीण सड़कों, देहरादून के प्रमुख पुलों, पेयजल योजनाओं और जल विद्युत इकाइयों की तकनीकी निगरानी पर देखा जा रहा है, जिससे राज्य की विकास गति प्रभावित हो रही है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड में डिप्लोमा इंजीनियरों की हड़ताल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीकी कर्मचारियों की भूमिका विकास कार्यों और आवश्यक सेवाओं में कितनी महत्वपूर्ण है। एस्मा जैसी सख्त चेतावनियों के बावजूद आंदोलन का जारी रहना सरकार और कर्मचारियों के बीच संवाद की कमी को दर्शाता है। यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो इसका असर न केवल विकास परियोजनाओं बल्कि आम जनता की रोजमर्रा की जरूरतों पर भी गहराता जाएगा।


