“मां अब करवट तक नहीं बदल पातीं, आंखें बंद करती हैं तो राटवीलर का हमला याद आता है” — पीड़िता का बेटा उमंग
देहरादून | 12 जुलाई 2025
देहरादून के जाखन क्षेत्र में रॉटवीलर कुत्तों के हमले में बुरी तरह घायल हुई 75 वर्षीय कौशल्या देवी न सिर्फ शारीरिक दर्द से जूझ रही हैं, बल्कि मानसिक आघात भी इतना गहरा है कि हर रात उन्हें कुत्तों की गुर्राहट नींद में सुनाई देती है। घटना को एक हफ्ता बीत चुका है, लेकिन उनका डर, पीड़ा और परिवार की परेशानी हर दिन और बढ़ रही है।
तीन सर्जरी, दो बाकी — जिंदगी ICU में
- अब तक 3 बड़ी सर्जरी हो चुकी हैं।
- 200 से ज्यादा टांके, हाथ की टूटी हड्डी में रॉड, कटा हुआ कान और अब भी त्वचा की ग्राफ्टिंग बाकी है।
- इलाज पर अब तक ₹2.5 लाख से अधिक खर्च हो चुका है।
- अभी दो सर्जरी और प्रस्तावित हैं।
कौशल्या देवी श्री महंत इंदिरेश अस्पताल में भर्ती हैं। उनका बेटा उमंग अपने काम को छोड़कर अस्पताल में डटा हुआ है। बहू हर वक्त मां की सेवा में है और घर पर बच्चा अकेला पड़ा है। पूरा परिवार मानसिक और आर्थिक त्रासदी से गुजर रहा है।
घटना का विवरण: मंदिर जा रहीं थीं, मौत से सामना हो गया
पिछले रविवार की सुबह कौशल्या देवी रोज़ की तरह मंदिर जा रही थीं, जब दो पालतू रॉटवीलर कुत्तों ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया।
- हमला इतना खतरनाक था कि उनका एक कान पूरी तरह नोच डाला गया।
- हाथ-पैरों में गहरे जख्म आए और हड्डियां टूट गईं।
- स्थानीय लोगों ने किसी तरह उन्हें बचाया, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका था।
“किसी को हमारी सुनवाई की फुर्सत नहीं” — पीड़िता का परिवार
पीड़िता के बेटे उमंग निर्वाल ने बताया:
“मां अब खुद से करवट तक नहीं बदल सकतीं। खाने-पीने से लेकर शौच जाने तक हर चीज़ में मदद करनी पड़ रही है। बीपी और शुगर की मरीज हैं, और अब यह दर्द… पूरी रात जागती रहती हैं।”
उमंग का आरोप है कि कुत्तों के मालिक पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस को शिकायत दी गई, लेकिन जवाब सिर्फ “देखेंगे” तक सीमित है।
“अगर आज हमारी मां के साथ ऐसा हुआ है, तो कल किसी और के साथ क्यों नहीं होगा? ऐसे जानलेवा शौक पर सरकार की कोई नीति क्यों नहीं है?”
प्रशासन और कानून पर गंभीर सवाल
- क्या खतरनाक कुत्तों को पालने पर नियम लागू नहीं हैं?
- प्रशासन अब तक कुत्तों के मालिक से जवाबदेही क्यों तय नहीं कर पाया?
- पीड़ित परिवार की आर्थिक मदद और कानूनी सहयोग कहां है?
क्या कहता है कानून?
रॉटवीलर जैसे खतरनाक नस्ल के कुत्तों पर कई राज्य प्रतिबंध लगा चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर पालतू जानवरों की जिम्मेदारी और हमलों की जवाबदेही को लेकर दिशा-निर्देश दिए हैं। लेकिन उत्तराखंड में ऐसी घटनाओं के बावजूद न कोई नीति, न कोई कार्रवाई।
निष्कर्ष:
एक वृद्ध महिला जिंदगी और मौत से लड़ रही है, उसका परिवार टूट रहा है, लेकिन कुत्ते के मालिक पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं। यह घटना सिर्फ एक हमले की कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था की चुप्पी और मानवता की अनदेखी की ज्वलंत मिसाल है।
क्या आप भी मानते हैं कि खतरनाक कुत्तों पर पाबंदी की जरूरत है? क्या पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए?
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