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उत्तराखंड में मदरसों की संबद्धता प्रक्रिया पर सख्ती, अब सीईओ करेंगे नियमित निगरानी

देहरादून | 12 मई 2026

उत्तराखंड सरकार ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता लाने और मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब राज्य में पहली से आठवीं कक्षा तक संचालित मदरसों की संबद्धता प्रक्रिया की नियमित निगरानी संबंधित जिलों के मुख्य शिक्षा अधिकारी (सीईओ) करेंगे। शिक्षा विभाग ने इस संबंध में सभी 13 जिलों को निर्देश जारी कर दिए हैं।


प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि प्रत्येक जिले के सीईओ मदरसों की संबद्धता प्रक्रिया की प्रगति पर लगातार नजर रखेंगे और समय-समय पर रिपोर्ट निदेशालय को भेजेंगे। सरकार का उद्देश्य राज्य की शिक्षा प्रणाली को व्यवस्थित और समान बनाना है, ताकि सभी बच्चों को एक समान शैक्षिक अवसर मिल सकें।


दरअसल, राज्य सरकार ने पिछले वर्ष अक्टूबर में उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू किया था। इस अधिनियम के तहत राज्य में संचालित सभी मदरसे एक जुलाई 2026 से नवगठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के दायरे में आ जाएंगे। इसके लागू होने के साथ ही वर्तमान उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।


शिक्षा विभाग के अनुसार पहली से आठवीं तक संचालित मदरसों को जिला स्तर पर संबद्धता लेनी होगी, जबकि नौवीं से बारहवीं तक संचालित मदरसों को 30 जून 2026 तक उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से संबद्धता प्राप्त करनी अनिवार्य होगी।


प्रभारी प्रारंभिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल कुमार सती ने बताया कि पहली से आठवीं तक के मदरसों को शिक्षा विभाग के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन करना होगा। यदि आवेदन प्रक्रिया के दौरान किसी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक समस्या आती है, तो संबंधित जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी से संपर्क किया जा सकेगा।


उन्होंने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि संबद्धता प्रक्रिया तय समयसीमा के भीतर पूरी हो। इसके लिए प्रत्येक जिले में नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित की जाएंगी और लंबित मामलों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी।


नई शिक्षा व्यवस्था के तहत मदरसों में पारंपरिक धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विषयों को भी शामिल किया जाएगा। सरकार का फोकस विज्ञान, गणित, कंप्यूटर शिक्षा और आधुनिक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने पर है, ताकि अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चे प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा से जुड़ सकें और बेहतर भविष्य बना सकें।


सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य केवल प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाना नहीं, बल्कि मुस्लिम सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है। शिक्षा विभाग का मानना है कि इससे मदरसों में पढ़ने वाले छात्र भी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सकेंगे।


राज्य सरकार ने इसके लिए उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन भी कर दिया है। प्राधिकरण में प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी को अध्यक्ष बनाया गया है। इसके अलावा प्रो. राकेश जैन, डॉ. सैय्यद अली हमीद, प्रो. पेमा तेनजिन, डॉ. एल्बा मेड्रेले, प्रो. रोबिना अमन, प्रो. गुरमीत सिंह, सेवानिवृत्त आईएएस चंद्रशेखर भट्ट और राजेंद्र सिंह बिष्ट को सदस्य नियुक्त किया गया है।


शिक्षा महानिदेशक और एससीईआरटी निदेशक को पदेन सदस्य बनाया गया है, जबकि निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण को पदेन सदस्य सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यही प्राधिकरण भविष्य में पाठ्यक्रम, संबद्धता और शिक्षा मानकों से जुड़े निर्णय लेगा।


निष्कर्ष

उत्तराखंड सरकार की यह नई व्यवस्था राज्य की शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है। मदरसों को आधुनिक शिक्षा और समान पाठ्यक्रम से जोड़ने की पहल से अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों को मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा में आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इस नई व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करना सरकार और शिक्षा विभाग के लिए बड़ी चुनौती भी होगा।

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