स्थान: देहरादून, उत्तराखंड
दिनांक: 8 अक्टूबर 2026
उत्तराखंड में संस्कृत भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाने की तैयारी की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संस्कृत शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए कि बच्चों को संस्कृत पढ़ाने के साथ-साथ उनकी आयु और रुचि के अनुसार वेद, उपनिषद, पुराण और अन्य महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथों की जानकारी भी दी जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके लिए ऐसे सरल और प्रभावी माध्यम तैयार किए जाएं, जिससे बच्चे इन ग्रंथों और भारतीय ज्ञान परंपरा को आसानी से समझ सकें। उनका कहना था कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण आधार है।
आदर्श संस्कृत ग्रामों में सालभर हों गतिविधियां
सीएम धामी ने कहा कि आदर्श संस्कृत ग्रामों में संस्कृत से जुड़ी गतिविधियां केवल विशेष अवसरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इन गांवों में पूरे वर्ष नियमित रूप से संस्कृत संवाद, संस्कृत कन्वर्सेशन और भाषा आधारित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बच्चों को संस्कृत भाषा के अध्ययन के साथ भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों और प्राचीन ज्ञान परंपरा से जोड़ने के लिए नए कार्यक्रम तैयार किए जाएं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार देना भी जरूरी है। भारत की प्राचीन परंपरा में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना रही है और संस्कृत के माध्यम से विश्व कल्याण, सद्भाव तथा मानवता का संदेश नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
धार्मिक स्थलों पर भी बढ़ेगा संस्कृत का प्रचार
मुख्यमंत्री ने राज्य के प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक स्थलों पर संस्कृत के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने के निर्देश भी दिए। उन्होंने कहा कि चारधाम के अलावा हर की पैड़ी, जागेश्वर धाम, आदि कैलाश, पूर्णागिरि, सुरकंडा देवी, धारी देवी, गर्जिया देवी मंदिर और वीरभद्र ऋषिकेश समेत अन्य प्रमुख स्थलों पर संस्कृत को लोगों तक पहुंचाने की प्रभावी व्यवस्था की जाए।
इन स्थानों पर संस्कृत के प्रेरक वाक्य, श्लोक और उनके सरल अर्थ प्रदर्शित करने की व्यवस्था करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों को संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति से अधिक प्रभावी तरीके से जोड़ना है।
‘संस्कृत के लिए धन की कमी नहीं होने देंगे’
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि संस्कृत उत्तराखंड की दूसरी राजभाषा है और इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सरकार गंभीरता से काम कर रही है।
उन्होंने अधिकारियों से कहा कि संस्कृत शिक्षा और इसके प्रचार-प्रसार से जुड़े प्रभावी कार्यों के लिए धन की कमी नहीं होने दी जाएगी। आगामी कुंभ को देखते हुए हरिद्वार में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश भी दिए गए।
मुख्यमंत्री के अनुसार कुंभ के दौरान देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं। ऐसे में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यापक स्तर पर सामने रखने के लिए नई और रचनात्मक पहल की जानी चाहिए।
13 जिलों में शुरू हो चुके हैं आदर्श संस्कृत ग्राम
सचिव संस्कृत शिक्षा दीपक कुमार ने बैठक में विभाग की ओर से किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य के सभी 13 जिलों में एक-एक आदर्श संस्कृत ग्राम शुरू किया जा चुका है।
इन गांवों में संस्कृत को केवल पढ़ाई तक सीमित रखने के बजाय दैनिक बोलचाल और व्यवहार का हिस्सा बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर भी संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।
विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और सम्मान योजनाएं
संस्कृत शिक्षा के विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं। इनमें गार्गी संस्कृत बालिका छात्रवृत्ति, डॉ. भीमराव अंबेडकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति संस्कृत छात्रवृत्ति और संस्कृत छात्र प्रतिभा सम्मान जैसी योजनाएं शामिल हैं।
इन योजनाओं के माध्यम से संस्कृत शिक्षा से जुड़े विद्यार्थियों को प्रोत्साहन देने और प्रतिभाशाली छात्रों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
संस्कृत आयोग की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी
राज्य में संस्कृत शिक्षा को व्यापक स्तर पर मजबूत करने के लिए संस्कृत आयोग के गठन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है। इसके तहत संस्कृत शिक्षा, शोध, प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण और उनके डिजिटलीकरण पर काम करने की योजना है।
इसके साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक एवं शास्त्रीय अध्ययन और आधुनिक तकनीक में संस्कृत के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड सरकार संस्कृत को केवल एक विषय के रूप में पढ़ाने के बजाय इसे भारतीय ज्ञान, संस्कृति और जीवन मूल्यों से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। स्कूलों में बच्चों की उम्र और रुचि के अनुसार वेद, उपनिषद और पुराणों की जानकारी देने की पहल इसी प्रयास का हिस्सा है। वहीं धार्मिक स्थलों, आदर्श संस्कृत ग्रामों और कुंभ जैसे बड़े आयोजनों के जरिए संस्कृत को आम लोगों तक पहुंचाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है।


