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दिनदहाड़े हमलावर बन रहे गुलदार: टिहरी में 92% हमले दिन में, लैंटाना झाड़ियां बढ़ा रहीं खतरा

स्थान: देहरादून/टिहरी, उत्तराखंड
तारीख: 28 मार्च 2026

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अब तक यह माना जाता रहा कि गुलदार (तेंदुआ) रात के समय अधिक सक्रिय होते हैं, लेकिन एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। शोध के अनुसार, अब गुलदार रात का इंतजार किए बिना दिन के उजाले में ही इंसानों और मवेशियों पर हमला कर रहे हैं।


यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित ‘बायलाजी बुलेटिन’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें टिहरी जिले को केंद्र में रखकर 2011 से 2021 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस शोध का नेतृत्व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के सेवानिवृत्त प्रोफेसर दिनेश भट्ट ने किया। अध्ययन में 300 से अधिक ग्रामीणों की राय और घटनाओं के विस्तृत आंकड़ों को शामिल किया गया।


11 साल में 29 मौतें, 77 लोग घायल
शोध में सामने आया कि 11 वर्षों के दौरान गुलदार के हमलों में 29 लोगों की मौत हुई, जबकि 77 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हालांकि हाथी और भालू जैसे अन्य जंगली जानवरों के हमले भी दर्ज किए गए, लेकिन उनकी संख्या गुलदार के मुकाबले काफी कम रही। विशेषज्ञों के अनुसार, तेंदुआ बेहद चालाक शिकारी होता है, जो घात लगाकर हमला करता है, जिससे मानव से उसका टकराव अधिक होता है।


दिन में ही हो रहे 92% हमले
प्रोफेसर दिनेश भट्ट के अनुसार, कुल हमलों में से 92 प्रतिशत हमले दिन के समय दर्ज किए गए, जबकि मात्र 8 प्रतिशत घटनाएं रात में हुईं। यह बदलाव न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि ग्रामीण जीवन के लिए बड़ा खतरा भी बनता जा रहा है।


पगडंडियां और घरों के आसपास सबसे ज्यादा खतरा
अध्ययन में यह भी सामने आया कि 61 प्रतिशत हमले गांवों की पगडंडियों पर हुए, जबकि 30 प्रतिशत हमले घरों के आसपास हुए। जंगल के भीतर हमलों की संख्या सबसे कम, केवल 7 प्रतिशत रही। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि ग्रामीण रोजमर्रा के कामों—खेत, बाजार और स्कूल—के लिए इन्हीं रास्तों का इस्तेमाल करते हैं।


लैंटाना झाड़ियों ने बढ़ाया जोखिम
शोध में एक अहम कारण लैंटाना नामक झाड़ी को बताया गया है। यह एक आक्रामक प्रजाति की घनी झाड़ी है, जो तेजी से फैल रही है। इसकी घनत्व इतनी अधिक होती है कि गुलदार आसानी से इसमें छिप सकता है और दिन में भी बिना दिखे हमला कर सकता है। गांवों के आसपास और खेतों के किनारों पर इन झाड़ियों का विस्तार मानव-वन्यजीव संघर्ष को और बढ़ा रहा है।


बदलता व्यवहार बढ़ा रहा चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में प्राकृतिक शिकार की कमी के कारण गुलदार अब मानव बस्तियों के नजदीक आने लगे हैं। भोजन की तलाश में वे गांवों के आसपास भटकते हैं और पालतू जानवरों के साथ-साथ इंसानों को भी निशाना बना रहे हैं। यह बदलता व्यवहार भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकता है।


निष्कर्ष:
यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि उत्तराखंड में गुलदारों का व्यवहार तेजी से बदल रहा है, जो मानव सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। विशेषज्ञों ने लैंटाना झाड़ियों के उन्मूलन, जागरूकता बढ़ाने और प्रभावी वन प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष और भयावह रूप ले सकता है।

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