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100 साल पुरानी गोशाला बनी मॉडर्न इको-कॉटेज: IIT रुड़की ने 10 घंटे में खड़ा किया टिकाऊ और भूकंपरोधी घर

देहरादून/पौड़ी गढ़वाल | 29 मार्च 2026

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक वास्तुकला को नई पहचान देते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की ने एक अनोखी पहल की है। संस्थान ने पौड़ी गढ़वाल जिले के एक गांव में करीब 100 साल पुरानी जर्जर गोशाला को आधुनिक, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल घर में बदलकर नई मिसाल पेश की है।


यह अभिनव परियोजना पौड़ी जनपद के यमकेश्वर ब्लॉक के फल्दाकोट गांव में पूरी की गई, जहां ‘गो-हैंप’ स्टार्टअप के सहयोग से इस पुराने ढांचे का पुनर्निर्माण किया गया। खास बात यह है कि इस आधुनिक कॉटेज को अत्याधुनिक हैंपक्रीट पैनल तकनीक के जरिए महज 10 घंटे में तैयार किया गया।


पारंपरिक शैली के साथ आधुनिक तकनीक का संगम

इस परियोजना में पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला की मूल पहचान को बरकरार रखते हुए आधुनिक निर्माण तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। हैंपक्रीट पैनलों से बने इस ढांचे की खासियत यह है कि यह कम लागत वाला, थर्मल इंसुलेशन युक्त, टिकाऊ और भूकंपरोधी है—जो पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त माना जा रहा है।


वैज्ञानिक-आर्किटेक्ट नम्रता कंडवाल की अगुवाई

इस परियोजना का नेतृत्व पौड़ी गढ़वाल की निवासी और IIT रुड़की की वैज्ञानिक-आर्किटेक्ट नम्रता कंडवाल ने किया। सतत निर्माण तकनीकों और इको-टूरिज्म के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज’ के तहत सम्मानित भी किया जा चुका है।


ग्रामीण अर्थव्यवस्था और होम-स्टे को मिलेगा बढ़ावा

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के मॉडर्न कॉटेज का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में होम-स्टे के रूप में किया जा सकता है, जिससे स्थानीय लोगों की आय में बढ़ोतरी होगी। कम समय और कम लागत में बनने वाले ये घर पहाड़ों में रोजगार और पर्यटन को नई दिशा दे सकते हैं।


पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम

‘गो-हैंप’ स्टार्टअप हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने की दिशा में भी अहम भूमिका निभा रहा है। यह हैंप आधारित निर्माण सामग्री जैसे प्रीमिक्स, इंसुलेशन बोर्ड और पैनल विकसित कर रहा है, जिससे रेत खनन और पहाड़ों में ब्लास्टिंग जैसी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में कमी लाई जा सके।


2030 तक 1000 इको-फ्रेंडली भवनों का लक्ष्य

स्टार्टअप ने वर्ष 2030 तक देशभर में 1000 हैंप आधारित भवन बनाने का लक्ष्य रखा है। यह पहल न केवल कम-कार्बन निर्माण को बढ़ावा देगी, बल्कि भारत को निर्माण सामग्री के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में भी मददगार साबित होगी।


तकनीकी सहयोग और भविष्य की संभावनाएं

इस परियोजना में उपयोग की गई फैब्रिकेटेड इंटरलॉकिंग हैंपक्रीट पैनल प्रणाली को इंडिया इंफोलाइन फाउंडेशन के सहयोग से विकसित किया गया है। IIT रुड़की के टाइड्स विभाग के सीईओ आजम अली खान के अनुसार, यह तकनीक देशभर में टिकाऊ और किफायती निर्माण का नया मॉडल बन सकती है।


निष्कर्ष

IIT रुड़की की यह पहल पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के संगम का बेहतरीन उदाहरण है। 100 साल पुरानी गोशाला का आधुनिक इको-कॉटेज में रूपांतरण न केवल तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि यह ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम भी है। आने वाले समय में यह मॉडल पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण की तस्वीर बदल सकता है।

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