नैनीताल, 9 सितंबर 2026
लंबे समय से अदालतों में चल रहे मुकदमों को आपसी सहमति और सुलह-समझौते के जरिए खत्म करने का मौका मिलने जा रहा है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली के निर्देश पर उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से 12 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया जाएगा। उत्तराखंड हाईकोर्ट के साथ ही प्रदेश की सभी निचली अदालतों में लोक अदालत की व्यवस्था की जाएगी।
इस दौरान अलग-अलग श्रेणी के ऐसे मामलों का निस्तारण किया जाएगा, जिनमें दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद समाप्त करने के लिए तैयार हों। बैंक रिकवरी, सिविल वाद और अपील, मोटर दुर्घटना से जुड़े मामलों के साथ पारिवारिक विवादों को भी सुलह के माध्यम से निपटाने का प्रयास किया जाएगा।
पति-पत्नी से लेकर भाई-बहन के विवाद तक होंगे शामिल
राष्ट्रीय लोक अदालत का उद्देश्य अदालतों में लंबे समय से लंबित मामलों का त्वरित और आपसी सहमति के आधार पर समाधान कराना है। इसमें पति-पत्नी के बीच विवाद के अलावा भाई-भाई और भाई-बहन के बीच चल रहे पारिवारिक मामलों को भी सुलह के आधार पर निपटाया जा सकता है।
इसके साथ ही बैंक रिकवरी, सिविल मामलों और अपील तथा मोटर दुर्घटना से संबंधित मामलों के पक्षकार भी लोक अदालत के माध्यम से विवाद का समाधान कर सकते हैं।
लोक अदालत में फैसला हुआ तो वापस मिलेगी कोर्ट फीस
लोक अदालत में मामले का निस्तारण होने पर पक्षकारों को आर्थिक राहत भी मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मामले के समाधान के बाद जमा की गई कोर्ट फीस वापस कर दी जाती है।
लोक अदालत में दोनों पक्षों की सहमति से होने वाला फैसला अंतिम और दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है। इस फैसले के खिलाफ सामान्य तौर पर अपील, रिवीजन या रिव्यू का प्रावधान नहीं होता। इससे पक्षकारों का लंबे समय तक चलने वाला कानूनी विवाद और उससे जुड़ा खर्च भी कम होता है।
12 सितंबर से पहले करा सकते हैं मामला दर्ज
जो पक्षकार अपने लंबित मामले को आपसी सुलह के आधार पर समाप्त कराना चाहते हैं, वे राष्ट्रीय लोक अदालत से पहले संबंधित विधिक सेवा प्राधिकरण या समिति से संपर्क कर सकते हैं। इसके लिए उत्तराखंड विधिक सेवा समिति के एडीआर भवन में संपर्क कर अपने मामले को पंजीकृत कराया जा सकता है।
बिना अनुमति चल रही आरा मशीनों के मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई
इसी बीच उत्तराखंड हाईकोर्ट में हरिद्वार समेत प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में बिना अनुमति संचालित की जा रही आरा मशीनों से जुड़े मामले पर भी सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने की।
सुनवाई के बाद अदालत ने जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए वन विभाग के मुखिया को संबंधित प्रत्यावेदन को नियमानुसार निस्तारित करने के निर्देश दिए। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में आरा मशीन संचालकों का पक्ष भी सुना जाए।
बिना लाइसेंस आरा मशीनें चलने का लगाया गया था आरोप
मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी सामाजिक कार्यकर्ता मनु राठी ने जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार राज्यों में बिना सरकार की अनुमति के आरा मशीनों का संचालन नहीं किया जा सकता।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2024 में इसके लिए नियमावली बनाई थी, जिसके तहत आरा मशीन चलाने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी है। इसके लिए तीन लाख रुपये की फीस जमा किए जाने का भी प्रावधान बताया गया।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि वन विभाग के अधिकारियों की कथित मिलीभगत के चलते हरिद्वार समेत कई क्षेत्रों में बिना लाइसेंस आरा मशीनें संचालित की जा रही हैं। इससे सरकारी राजस्व को भी नुकसान होने की बात याचिका में कही गई थी।
अवैध आरा मशीनों को बंद कराने की मांग
जनहित याचिका में अदालत से मांग की गई थी कि बिना अनुमति और लाइसेंस संचालित हो रही आरा मशीनों को बंद कराने के लिए सरकार को निर्देश दिए जाएं। सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित पक्षों की बात सुनी और वन विभाग के अधिकारियों को नियमों के तहत मामले पर निर्णय लेने के निर्देश दिए।
निष्कर्ष
12 सितंबर को आयोजित होने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण अवसर है, जो लंबे समय से चल रहे मुकदमों को आपसी सहमति से समाप्त करना चाहते हैं। लोक अदालत में समाधान होने पर कोर्ट फीस की वापसी, समय की बचत और लंबी कानूनी प्रक्रिया से राहत जैसे फायदे मिलते हैं। वहीं, आरा मशीनों से जुड़े मामले में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब वन विभाग को नियमों के तहत संबंधित प्रत्यावेदन पर कार्रवाई करनी होगी।


