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हिमालय दिवस पर देहरादून में गूंजा पर्यावरण संरक्षण का संदेश, उठी अनियंत्रित विकास पर रोक की मांग

देहरादून, 9 सितंबर 2026

हिमालय को बचाने की मुहिम केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। हिमालय दिवस के मौके पर देहरादून में आयोजित जनजागरूकता कार्यक्रम में पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और बच्चों ने इसी संदेश को प्रमुखता से उठाया। कार्यक्रम में हिमालय के लगातार बदलते स्वरूप, जंगलों की कटाई, पहाड़ों की अनियंत्रित कटिंग और बढ़ते मानवीय दबाव को लेकर चिंता जताई गई।

बच्चों की तख्तियों ने खींचा ध्यान

देहरादून के परेड ग्राउंड के पास आयोजित कार्यक्रम में सिटीजन फॉर ग्रीन देहरादून सहित विभिन्न पर्यावरण संगठनों के कार्यकर्ता, बच्चे, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी शामिल हुए।

कार्यक्रम में छोटे बच्चों की भागीदारी खास आकर्षण का केंद्र रही। बच्चे हाथों में अलग-अलग संदेश लिखी तख्तियां लेकर पहुंचे। इनमें हिमालय और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संदेशों के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए पहाड़ों को सुरक्षित रखने की अपील की गई।

बच्चों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि हिमालय का संरक्षण केवल वर्तमान समय की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।

नुक्कड़ नाटक के जरिए सामने रखी हिमालय की चुनौतियां

कार्यक्रम के दौरान नुक्कड़ नाटक भी प्रस्तुत किया गया। इसके जरिए पहाड़ों में बढ़ते पर्यटन, निर्माण गतिविधियों और प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन से पैदा हो रही चुनौतियों को लोगों के सामने रखा गया।

नाटक में नेताओं, अधिकारियों, पर्यटकों और आम नागरिकों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह संदेश दिया गया कि हिमालय को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी एक वर्ग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पहाड़ों में बढ़ता मानवीय दबाव सामूहिक चिंता का विषय है।

कार्यक्रम के माध्यम से लोगों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि हिमालय को केवल पर्यटन या विकास की संभावनाओं के रूप में देखने के बजाय एक बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के तौर पर समझने की जरूरत है।

‘हिमालय दिवस और हरेला सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं’

सिटीजन फॉर ग्रीन देहरादून के संस्थापक और पर्यावरणविद् हिमांशु अरोड़ा ने कहा कि संगठन लगातार पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर लोगों को जागरूक करने का प्रयास करता रहा है।

उन्होंने कहा कि हिमालय दिवस हो या हरेला, प्रकृति के नाम पर सिर्फ एक दिन कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है। यदि वास्तव में हिमालय को बचाना है तो पूरे वर्ष पर्यावरण संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।

हिमांशु अरोड़ा ने पेड़ों के कटान पर चिंता जताते हुए कहा कि उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में जिस तेजी से पेड़ काटे जा रहे हैं, उस पर रोक लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उनका कहना था कि उत्तराखंड की पहचान और भविष्य हिमालय से जुड़ा है और हिमालय के बिना प्रदेश की कल्पना मुश्किल है।

देहरादून भी हिमालय में हो रहे बदलावों से अछूता नहीं

वरिष्ठ इतिहासकार लोकेश ओहरी ने कहा कि हिमालय में हो रहे बदलावों का असर केवल ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। दून घाटी भी इससे प्रभावित हो रही है।

उन्होंने बताया कि देहरादून घाटी शिवालिक हिमालय के महत्वपूर्ण हिस्से में स्थित है और इसके दोनों ओर गंगा तथा यमुना जैसी प्रमुख नदियां बहती हैं। हिमालय में लगातार हो रहा क्षरण और बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं दून घाटी के लिए भी गंभीर चिंता का विषय हैं।

उनके मुताबिक पहाड़ों में होने वाले पर्यावरणीय बदलावों का प्रभाव धीरे-धीरे मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच रहा है और देहरादून भी इससे अलग नहीं है।

जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर हिमालयी क्षेत्रों पर

समाजसेवी अनूप नौटियाल ने कार्यक्रम में जलवायु न्याय का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हिमालय दुनिया के महत्वपूर्ण मीठे पानी के भंडारों में शामिल है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन का असर हिमालयी क्षेत्रों पर तेजी से दिखाई दे रहा है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का कार्बन उत्सर्जन देश के कई हिस्सों की तुलना में कम है और प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मैदानी इलाकों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है। इसके बावजूद ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर हिमालयी क्षेत्रों को झेलना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि आने वाले चुनावों में हिमालय और हिमालयी क्षेत्रों के लोगों से जुड़े जलवायु न्याय के मुद्दे को भी गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।

हिमालय सिर्फ विरासत नहीं, जिम्मेदारी भी

कार्यक्रम में लगाए गए पोस्टरों और तख्तियों के माध्यम से हिमालय संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक किया गया। आयोजन से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि हिमालय को केवल प्राकृतिक विरासत मानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी समाज और सरकार दोनों की है।

हिमालय के जंगल, नदियां, पहाड़ और वहां रहने वाले लोगों का भविष्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करना आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है।

निष्कर्ष

हिमालय दिवस पर देहरादून में आयोजित कार्यक्रम ने एक बार फिर इस सवाल को सामने ला दिया कि हिमालय के संरक्षण को महज प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित रखा जाए या पूरे वर्ष ठोस कदम उठाए जाएं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों की मांग साफ है कि विकास की योजनाएं हिमालय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर बनाई जाएं। कार्यक्रम से उठी आवाज का सार यही रहा कि हिमालय सुरक्षित रहेगा, तभी जंगल, नदियां, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।

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