देहरादून | 27 सितंबर 2026
देहरादून के कॉलेज परिसरों में छात्रसंघ चुनाव का माहौल तैयार है। इस बार चुनाव सिर्फ अलग-अलग प्रत्याशियों के बीच मुकाबला नहीं है, बल्कि कैंपस की पारंपरिक छात्र राजनीति और नई पीढ़ी की बदलती पसंद के बीच भी एक दिलचस्प तस्वीर सामने आ रही है। डीएवी, डीबीएस, एमकेपी और एसजीआरआर पीजी कॉलेज में बड़ी संख्या में जेन-जी मतदाता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे।
नई पीढ़ी के मतदाताओं के बीच संगठन की पहचान के साथ प्रत्याशी का व्यक्तिगत व्यवहार, छात्र मुद्दों पर उसकी पकड़ और जरूरत के समय उपलब्धता जैसे पहलू भी चर्चा में हैं। ऐसे में छात्र संगठनों के सामने चुनौती केवल अपना पारंपरिक आधार बनाए रखने की नहीं, बल्कि बदलते संवाद के तौर-तरीकों के साथ छात्रों तक पहुंचने की भी है।
संगठन की पहचान के साथ चेहरे पर भी नजर
जेन-जी मतदाताओं को किसी एक राजनीतिक सोच या चुनावी खांचे में बांधना आसान नहीं है। छात्र संगठन कैंपस की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के लिए प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि और उसके मुद्दे भी चुनावी पसंद को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी कारण इस बार कॉलेज परिसरों में यह चर्चा सुनाई दे रही है कि मतदान संगठन के नाम पर होगा या उस प्रत्याशी के पक्ष में, जो छात्र समस्याओं के समय उनके बीच मौजूद रहता है।
कैंपस की राजनीति पर राष्ट्रीय दलों की छाया
डीएवी, डीबीएस, एमकेपी और एसजीआरआर पीजी कॉलेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) से जुड़े प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। दोनों संगठनों की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि और छात्र राजनीति में स्थापित पहचान है।
हालांकि छात्रसंघ चुनावों में बड़े राजनीतिक दलों की छाया दिखाई देती है, लेकिन इन चुनावों को सीधे विधानसभा या लोकसभा चुनावों का जनमत मानना अलग विषय है। इसके बावजूद कैंपस चुनावों के जरिए छात्र संगठनों की सक्रियता, युवाओं तक उनकी पहुंच और नई पीढ़ी के मुद्दों के साथ उनके संवाद की तस्वीर जरूर सामने आती है।
मोबाइल स्क्रीन से कैंपस की मतपेटी तक पहुंचा प्रचार
जेन-जी की मौजूदगी ने चुनाव प्रचार का तरीका भी बदल दिया है। अब प्रत्याशियों की पहुंच केवल कॉलेज परिसर, पोस्टर और आमने-सामने की बैठकों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, मैसेज और सीधे डिजिटल संवाद के जरिए भी छात्र नेताओं की सक्रियता दिखाई दे रही है।
हालांकि सोशल मीडिया पर किसी प्रत्याशी की लोकप्रियता कितने वोटों में बदलती है, इसका पता चुनाव परिणाम आने के बाद ही चलेगा। डिजिटल सक्रियता और वास्तविक मतदान के बीच कितना संबंध है, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
छात्रों के मुद्दे सीधे और रोजमर्रा से जुड़े
नई पीढ़ी के मतदाताओं के लिए कैंपस से जुड़े कई व्यावहारिक सवाल महत्वपूर्ण हैं। फीस में बढ़ोतरी, परीक्षाओं का समय पर होना, परिणाम जारी होने में देरी, छात्रावास की सुविधा, पुस्तकालय और कक्षाओं की स्थिति जैसे मुद्दे सीधे छात्रों के दैनिक अनुभव से जुड़े हैं।
इसके अलावा पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार और करियर के अवसर भी युवाओं के बीच चर्चा का हिस्सा हैं। ऐसे में प्रत्याशियों के लिए केवल बड़े नारों के बजाय इन मुद्दों पर अपनी भूमिका और योजनाओं को छात्रों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण हो सकता है।
झंडे से आगे बढ़कर प्रत्याशी की पहचान
कैंपस में संगठन का मजबूत नेटवर्क किसी भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही व्यक्तिगत संपर्क और छात्रों के बीच प्रत्याशी की मौजूदगी भी चुनावी समीकरण का हिस्सा बन सकती है।
यही वजह है कि इस बार छात्रसंघ चुनाव में एक सवाल लगातार चर्चा में है—क्या संगठन का मजबूत ढांचा निर्णायक भूमिका निभाएगा या छात्रों के बीच व्यक्तिगत पहुंच रखने वाला प्रत्याशी भी अपनी जगह बना पाएगा?
‘तुरंत जवाब’ चाहती नई पीढ़ी
जेन-जी के चुनावी व्यवहार से जुड़ी एक प्रमुख चर्चा संवाद की गति को लेकर भी है। छात्र समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया और सीधे संवाद की अपेक्षा रखते हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है।
ऐसे में केवल चुनाव के दौरान सक्रिय दिखाई देने वाले प्रत्याशी और पूरे साल कॉलेज परिसर में छात्रों के बीच मौजूद रहने वाले चेहरे के बीच अंतर भी चुनावी चर्चा का विषय बन रहा है।
निष्कर्ष
देहरादून के छात्रसंघ चुनाव इस बार पारंपरिक छात्र राजनीति के साथ नई पीढ़ी की बदलती संवाद शैली और प्राथमिकताओं को भी सामने ला रहे हैं। संगठन, प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, सोशल मीडिया सक्रियता और छात्र हितों से जुड़े स्थानीय मुद्दे—इन सभी के बीच मतदाताओं की पसंद सामने आएगी। हालांकि जेन-जी मतदाताओं के रुझान को किसी एक पैटर्न में बांधना संभव नहीं है। चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि इस बार कैंपस की राजनीति में संगठनात्मक पहचान और व्यक्तिगत संपर्क में से किस तरह के समीकरण उभरकर सामने आते हैं।


