देहरादून | 28 सितंबर 2026
मध्य प्रदेश के ग्वालियर से करीब 550 किलोमीटर का सफर तय कर व्हाइट टाइगर तेजस देहरादून चिड़ियाघर पहुंच गया है। नए माहौल में पहुंचने के बाद तेजस ने बेहद शांत अंदाज में अपने बाड़े में चहलकदमी शुरू कर दी। लंबी यात्रा के बावजूद उसके व्यवहार में किसी तरह की बेचैनी या आक्रामकता नजर नहीं आई। सफेद फर, काली धारियों और नीली आंखों वाला यह करीब ढाई साल का बाघ फिलहाल चिड़ियाघर के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
शांत अंदाज में नए बाड़े को अपनाया
ग्वालियर से देहरादून तक की लंबी यात्रा के बाद जब तेजस को उसके नए बाड़े में छोड़ा गया तो उसने धीरे-धीरे पूरे परिसर को देखना शुरू किया। वह बाड़े में घूमता और आसपास के वातावरण को समझता नजर आया।
चिड़ियाघर के कर्मचारियों के लिए भी तेजस का आगमन खास है, क्योंकि यहां काम करने वाले कई कर्मचारियों ने पहली बार व्हाइट टाइगर को इतने करीब से देखा है।
करीब 20 दिन निगरानी में रहेगा तेजस
वन्यजीवों को एक चिड़ियाघर से दूसरे चिड़ियाघर में लाए जाने के बाद निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत कुछ समय के लिए क्वारंटीन में रखा जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत तेजस को भी करीब 20 दिनों तक क्वारंटीन और विशेष निगरानी में रखा जाएगा।
इस अवधि में उसके स्वास्थ्य, खान-पान और व्यवहार पर लगातार नजर रखी जाएगी। फिलहाल उसके बाड़े तक केवल अधिकृत बाड़ा कीपर और पशु चिकित्सक ही पहुंच सकेंगे। क्वारंटीन अवधि पूरी होने के बाद ही उसे पर्यटकों के लिए प्रदर्शित किया जाएगा।
14 घंटे से ज्यादा का सफर
तेजस ने ग्वालियर से देहरादून तक करीब 550 किलोमीटर की दूरी तय की है। ट्रांसलोकेशन के दौरान उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए वाहन की गति नियंत्रित रखी गई। करीब 14 घंटे से अधिक की यात्रा के दौरान विशेषज्ञ टीम उसकी सेहत और गतिविधियों पर नजर रखती रही।
ग्वालियर से आई टीम तेजस के साथ उसकी हेल्थ रिपोर्ट और डाइट चार्ट भी लेकर पहुंची है। देहरादून चिड़ियाघर में फिलहाल उसी डाइट और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के आधार पर उसकी देखभाल की जा रही है, ताकि नए वातावरण में उसके खान-पान और दिनचर्या में अचानक बदलाव न हो।
नीली आंखें और सफेद फर बनाते हैं खास
तेजस की सबसे खास पहचान उसका सफेद फर, गहरी काली धारियां और नीली आंखें हैं। करीब ढाई साल की उम्र होने के कारण वह अभी काफी सक्रिय और चंचल है। वह बाड़े में घूमने के साथ खेलता और कभी-कभी बाड़े के सहारे खड़े होकर अटखेलियां करता दिखाई दे रहा है।
व्हाइट टाइगर को लेकर यह समझना जरूरी है कि यह कोई अलग प्रजाति नहीं है। यह सामान्य बाघ ही होता है, जिसमें आनुवंशिक बदलाव के कारण उसके शरीर का सामान्य नारंगी रंग सफेद दिखाई देता है।
सामान्य बाघ से कैसे अलग है तेजस?
आमतौर पर रॉयल बंगाल टाइगर का फर नारंगी या पीले-भूरे रंग का होता है और उस पर काली धारियां होती हैं। वहीं व्हाइट टाइगर में शरीर का आधार रंग सफेद होता है, जबकि काली धारियां बरकरार रहती हैं।
बाघ की धारियों का पैटर्न भी उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। प्रत्येक बाघ की धारियों का पैटर्न अलग होता है, जिसके आधार पर वन्यजीव विशेषज्ञ उसकी पहचान कर सकते हैं।
अल्बिनो बाघ नहीं है व्हाइट टाइगर
व्हाइट टाइगर को लेकर अक्सर यह धारणा सामने आती है कि वह अल्बिनो बाघ होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। इसके सफेद रंग का संबंध आनुवंशिक बदलाव से है। उसकी काली धारियां और आंखों का रंग मौजूद रहता है, इसलिए उसे पूर्ण अल्बिनो बाघ नहीं माना जाता।
रंग में अंतर के बावजूद उसके मूल व्यवहार और बाघ की प्राकृतिक विशेषताएं सामान्य बाघों जैसी ही रहती हैं। बाघ सामान्यतः अकेले रहना पसंद करने वाला मजबूत और फुर्तीला शिकारी होता है।
फिलहाल पर्यटकों को करना होगा इंतजार
तेजस को अभी पर्यटकों के सामने लाने में कुछ समय लगेगा। क्वारंटीन और निगरानी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही उसे डिस्प्ले एरिया में रखा जाएगा।
चिड़ियाघर में उसके लिए रॉयल बंगाल टाइगर के पास ही अलग बाड़ा तैयार किया गया है। ऐसे में भविष्य में पर्यटकों को एक ही स्थान पर सामान्य रंग वाले रॉयल बंगाल टाइगर के साथ सफेद रंग के व्हाइट टाइगर को देखने का मौका मिल सकेगा।
निष्कर्ष
देहरादून चिड़ियाघर में तेजस का आगमन वन्यजीव प्रेमियों के लिए खास आकर्षण बनने जा रहा है। फिलहाल उसकी सेहत और नए वातावरण में अनुकूलन पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। करीब 20 दिन की निगरानी पूरी होने के बाद जब तेजस पर्यटकों के सामने आएगा, तब उसकी नीली आंखें, सफेद फर और काली धारियां देहरादून जू के आकर्षण को और बढ़ाएंगी।



