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पिथौरागढ़ दुष्कर्म मामले में बड़ा खुलासा: शिक्षक नहीं, नाबालिग निकला नवजात का जैविक पिता; DNA रिपोर्ट ने बदली जांच की दिशा

पिथौरागढ़, 4 नवंबर 2026

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में नाबालिग छात्रा से जुड़े दुष्कर्म और जबरन गर्भपात के मामले में जांच के दौरान चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जिस शिक्षक को इस मामले में आरोपी बनाया गया था और जिसके खिलाफ पुलिस न्यायालय में आरोप-पत्र तक दाखिल कर चुकी थी, वह डीएनए जांच में नवजात का जैविक पिता नहीं पाया गया। फोरेंसिक रिपोर्ट में एक नाबालिग किशोर को मृत नवजात का जैविक पिता बताया गया है।

डीएनए रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस ने मामले की जांच की दिशा बदलते हुए संबंधित किशोर को अपने संरक्षण में लिया। उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया गया, जहां से आदेश मिलने के बाद अल्मोड़ा स्थित राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह भेज दिया गया।


जुलाई में सामने आया था छात्रा से जुड़ा गंभीर मामला

यह मामला जुलाई 2026 का है, जब पिथौरागढ़ में एक नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने और बाद में उसका जबरन गर्भपात कराए जाने की घटना सामने आई थी। उस समय परिजनों ने स्कूल के एक शिक्षक पर गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।

मामले का खुलासा उस वक्त हुआ, जब गर्भपात की दवा दिए जाने के बाद छात्रा की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उसे अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। परिजन तत्काल उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। चिकित्सकों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को इसकी सूचना दी, जिसके बाद मामले की जांच शुरू हुई।

शिक्षक के खिलाफ दर्ज हुआ था मुकदमा

पीड़िता के परिजनों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने संबंधित शिक्षक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(1) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5/6 के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

पुलिस ने शुरुआती जांच और परिजनों के बयानों के आधार पर शिक्षक को आरोपी बनाया। इसके बाद 24 जुलाई 2026 को पुलिस ने उसके खिलाफ न्यायालय में आरोप-पत्र भी दाखिल कर दिया था। हालांकि, मामले में आगे हुई वैज्ञानिक जांच ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया।

जंगल से जुटाए गए भ्रूण के अवशेष, DNA जांच से खुला राज

घटना के समय छात्रा करीब सात से आठ महीने की गर्भवती बताई गई थी। गर्भपात के बाद भ्रूण को जंगल में फेंक दिया गया था। पुलिस ने जांच के दौरान परिजनों की निशानदेही पर जंगल से भ्रूण के अवशेष एकत्र किए।

इसके बाद मृत नवजात के जैविक नमूने और अन्य जरूरी साक्ष्य डीएनए परीक्षण के लिए रुद्रपुर स्थित क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजे गए। पुलिस ने आरोपी बनाए गए शिक्षक का डीएनए नमूना भी जांच के लिए भेजा था।

रिपोर्ट में शिक्षक का डीएनए नवजात के जैविक नमूनों से मेल नहीं खाया। इससे स्पष्ट हुआ कि वह नवजात का जैविक पिता नहीं है। इसके बाद पुलिस ने मामले में अन्य संभावित संदिग्धों की भूमिका की जांच शुरू की।

दो अन्य संदिग्धों के नमूने भेजे, एक किशोर की हुई पहचान

शिक्षक की डीएनए रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया। इस क्रम में दो अन्य संदिग्धों के रक्त नमूने 12 अक्टूबर को डीएनए परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भेजे गए।

फोरेंसिक जांच रिपोर्ट में दोनों में से एक विधि-विवादित किशोर का डीएनए मृत नवजात के नमूनों से मेल खा गया। इस वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर पुलिस ने तीन नवंबर 2026 को संबंधित किशोर को अपने संरक्षण में लिया।

इसके बाद उसे किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश किया गया। बोर्ड के आदेश पर किशोर को अल्मोड़ा स्थित राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह भेज दिया गया है।

निष्कर्ष

पिथौरागढ़ का यह मामला जांच में वैज्ञानिक साक्ष्यों की अहम भूमिका को सामने लाता है। शुरुआत में जिस शिक्षक के खिलाफ गंभीर आरोपों के आधार पर मुकदमा दर्ज कर आरोप-पत्र दाखिल किया गया था, डीएनए रिपोर्ट में उसका नवजात से जैविक संबंध नहीं पाया गया। वहीं, आगे की जांच में एक नाबालिग किशोर की पहचान जैविक पिता के रूप में हुई। अब इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई किशोर न्याय बोर्ड और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगी।

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