देहरादून, उत्तराखंड | 4 सितंबर 2026
उत्तराखंड में हिमनद झीलों से संभावित आपदा के खतरे को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, सीबीआरआई को संवेदनशील हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने और उसके परीक्षण की अनुमति दे दी है।
इस महत्वपूर्ण परियोजना की शुरुआत वसुंधरा झील से की जाएगी। सीबीआरआई ने हिमनद झीलों के लिए विशेष अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार कर लिया है और इसी महीने संस्थान का विशेषज्ञ दल वसुंधरा झील पर उपकरण स्थापित करने के लिए रवाना होगा।
वसुंधरा झील पर सबसे पहले लगाया जाएगा सिस्टम
राज्य सरकार की अनुमति मिलने के बाद सीबीआरआई की टीम जल्द ही वसुंधरा झील पहुंचेगी। यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित कर उसके माध्यम से हिमनद झील की गतिविधियों और संभावित खतरों से जुड़ी सूचनाओं का अध्ययन किया जाएगा।
वसुंधरा झील पर सिस्टम लगाने के बाद प्राप्त होने वाले आंकड़ों और तकनीकी सूचनाओं के आधार पर आगे अन्य संवेदनशील झीलों पर भी इस तकनीक का विस्तार किया जाएगा।
हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद हिमनद झीलों से अचानक जलस्तर बढ़ने या झील टूटने जैसी संभावित घटनाओं को देखते हुए यह व्यवस्था आपदा प्रबंधन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अगले वर्ष अन्य संवेदनशील झीलों पर भी होगा विस्तार
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के अनुसार सीबीआरआई की टीम इसी महीने वसुंधरा झील पर आवश्यक उपकरण स्थापित करेगी।
इसके बाद अगले वर्ष अप्रैल और मई के दौरान प्रदेश की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर भी अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने की योजना है।
तब तक वसुंधरा झील पर स्थापित सिस्टम से मिलने वाली सूचनाओं और तकनीकी परिणामों का अध्ययन भी किया जा सकेगा। इसके आधार पर अन्य स्थानों पर सिस्टम को और अधिक प्रभावी तरीके से स्थापित करने में मदद मिलेगी।
प्रदेश में 13 हिमनद झीलें संवेदनशील श्रेणी में
उत्तराखंड में कुल 13 हिमनद झीलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। ये झीलें राज्य के पांच जिलों में स्थित हैं।
इन 13 झीलों में पांच झीलें ए श्रेणी में शामिल हैं। इसके अलावा चार झीलें बी श्रेणी और चार झीलें सी श्रेणी में रखी गई हैं।
राज्य सरकार की योजना इन सभी संवेदनशील हिमनद झीलों पर निगरानी और चेतावनी प्रणाली विकसित करने की है, ताकि किसी भी संभावित खतरे की समय रहते जानकारी मिल सके।
चार हिमनद झीलों का सर्वे पूरा
आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार प्रदेश में चिन्हित संवेदनशील हिमनद झीलों में से चार का सर्वेक्षण कार्य पूरा किया जा चुका है।
हिमनद झीलों की स्थिति, जलस्तर, आसपास के भौगोलिक क्षेत्र और संभावित खतरे का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है।
इस वर्ष केदारताल और सरस्वती ताल का भी अध्ययन और सर्वेक्षण किए जाने की योजना है।
सीबीआरआई के साथ सी-डैक की तकनीक का भी होगा उपयोग
उत्तराखंड सरकार केवल एक तकनीकी प्रणाली तक सीमित नहीं रहना चाहती। सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन के अनुसार सीबीआरआई के अलावा सी-डैक संस्था के माध्यम से भी हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा।
दो अलग-अलग तकनीकी संस्थानों की प्रणालियों के उपयोग से उनके परिणामों और कार्यप्रणाली की तुलना करने में मदद मिलेगी।
इससे राज्य सरकार को भविष्य में हिमनद झीलों की निगरानी के लिए सबसे प्रभावी और भरोसेमंद तकनीक का चयन करने का अवसर मिलेगा।
आपदा से पहले चेतावनी देने में मिलेगी मदद
हिमालयी राज्य उत्तराखंड में ग्लेशियरों और हिमनद झीलों की स्थिति लगातार आपदा प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण विषय बनी हुई है।
संवेदनशील झीलों में अचानक जलस्तर बढ़ने या अन्य असामान्य गतिविधियों की स्थिति में अर्ली वार्निंग सिस्टम समय रहते जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है।
समय पर चेतावनी मिलने से प्रशासन को प्रभावित क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ाने, लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और राहत एवं बचाव की तैयारी करने में सहायता मिल सकती है।
पांच जिलों की संवेदनशील झीलों पर रहेगी विशेष नजर
प्रदेश की 13 संवेदनशील हिमनद झीलें पांच अलग-अलग जिलों में स्थित हैं। इन क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और संभावित जोखिम को देखते हुए वैज्ञानिक निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग इन झीलों की स्थिति पर लगातार नजर रखने की दिशा में काम कर रहे हैं।
अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित होने के बाद हिमनद झीलों से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर संभावित जोखिमों का पहले से आकलन करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड की संवेदनशील हिमनद झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की मंजूरी राज्य के आपदा प्रबंधन तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। वसुंधरा झील से शुरू होने वाली इस परियोजना को भविष्य में प्रदेश की सभी 13 संवेदनशील हिमनद झीलों तक विस्तार देने की योजना है।
सीबीआरआई और सी-डैक जैसी तकनीकी संस्थाओं की मदद से विकसित की जा रही यह व्यवस्था संभावित हिमनद आपदाओं की समय रहते जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
वसुंधरा झील पर सिस्टम स्थापित होने के बाद मिलने वाले तकनीकी परिणामों के आधार पर अगले वर्ष अन्य संवेदनशील झीलों पर भी उपकरण लगाए जाएंगे। सरकार की यह पहल भविष्य में पर्वतीय क्षेत्रों और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।


