देहरादून, उत्तराखंड | 17 अक्टूबर 2026
उत्तराखंड में नशे के अवैध कारोबार पर लगाम लगाने के लिए पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है, लेकिन तस्करी का नेटवर्क अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी मुद्दे को लेकर देहरादून पुलिस लाइन में नशे के खिलाफ प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। कार्यक्रम में एडीजी वी. मुरुगेशन ने नशीले पदार्थों की तस्करी को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल ड्रग्स की बरामदगी पर्याप्त नहीं है। तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के साथ-साथ नशे की मांग कम करना और युवाओं को जागरूक करना भी जरूरी है।
कार्यक्रम के दौरान सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में उत्तराखंड में करीब 76 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ बरामद किए गए थे। वहीं, वर्ष 2026 में सितंबर तक यह आंकड़ा करीब 46 करोड़ रुपये रहा। ये आंकड़े प्रदेश में नशे के खिलाफ चल रही कार्रवाई और इस अवैध कारोबार से निपटने की चुनौती को रेखांकित करते हैं।
ड्रग्स की तस्करी के लिए नए रास्तों का इस्तेमाल
प्रशिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए एडीजी वी. मुरुगेशन ने कहा कि नशे की तस्करी अब केवल पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रह गई है। तस्कर ड्रोन और समुद्री मार्गों के माध्यम से भी नशीले पदार्थों की आपूर्ति कर रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नशीले पदार्थों की तस्करी के बदलते तरीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ देश सीधे युद्ध में सफलता हासिल नहीं कर पाने की स्थिति में नशे को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई करने के लिए पुलिस और संबंधित एजेंसियों को सतर्कता के साथ काम करना होगा।
एडीजी बोले- पकड़ा जा रहा केवल 10 प्रतिशत नशा
वी. मुरुगेशन ने नशे के अवैध कारोबार की गंभीरता पर बात करते हुए कहा कि उनके आकलन के अनुसार, तस्करी के कुल नेटवर्क का केवल लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा ही पकड़ में आ पाता है, जबकि बड़ी संख्या में तस्कर अब भी कार्रवाई से बाहर रह जाते हैं।
उन्होंने जोर दिया कि नशे की समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है, जब तस्करों की सप्लाई चेन पर प्रहार किया जाए और नशीले पदार्थों की मांग को भी कम किया जाए। केवल बरामदगी के आंकड़ों पर ध्यान देने के बजाय उन कारणों पर भी काम करना होगा, जिनकी वजह से युवा नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं।
नशामुक्त उत्तराखंड के लिए समाज की भागीदारी जरूरी
प्रशिक्षण शिविर में एडीजी ने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। इस अभियान में परिवारों, शिक्षण संस्थानों और समाज के अन्य वर्गों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
युवाओं को नशे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करना आवश्यक है। साथ ही, नशे की लत से जूझ रहे लोगों को मदद और उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्रवाई के साथ सामाजिक जागरूकता और सामूहिक प्रयास जुड़ेंगे, तभी नशे की मांग को कम करने और तस्करी पर प्रभावी अंकुश लगाने में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
बाइक रैली के जरिए दिया नशामुक्ति का संदेश
प्रशिक्षण शिविर से पहले ‘नशामुक्त देवभूमि, मेरी शुरुआत खुद से’ अभियान के तहत बाइक रैली निकाली गई। रैली के माध्यम से लोगों को नशे से दूर रहने और उत्तराखंड को नशामुक्त बनाने में अपनी भूमिका निभाने का संदेश दिया गया।
इस पहल का उद्देश्य आम लोगों, खासकर युवाओं को नशे के खिलाफ जागरूक करना और समाज में इसके दुष्परिणामों को लेकर समझ विकसित करना था।
बरामदगी के आंकड़े क्या बताते हैं?
- वर्ष 2024: उत्तराखंड में लगभग 76 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थ बरामद किए गए।
- जनवरी से सितंबर 2026 तक: करीब 46 करोड़ रुपये के नशीले पदार्थों की बरामदगी हुई।
- मुख्य चुनौती: तस्करी के नेटवर्क को तोड़ना, नए सप्लाई मार्गों पर निगरानी रखना और नशे की मांग को कम करना।
नोट: बरामदगी के मूल्य से अलग-अलग वर्षों में तस्करी की कुल मात्रा या नेटवर्क के आकार की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।
निष्कर्ष: उत्तराखंड में नशे के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद तस्करी पर पूरी तरह अंकुश लगाना चुनौती बना हुआ है। देहरादून में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इस लड़ाई में सख्त कार्रवाई के साथ जनजागरूकता और सामाजिक भागीदारी भी जरूरी है। नशामुक्त देवभूमि का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब पुलिस, परिवार और समाज मिलकर नशे की सप्लाई तथा मांग दोनों पर काम करें।


