देहरादून | 18 अप्रैल 2026
उत्तराखंड कांग्रेस में चल रही अंदरूनी खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। वरिष्ठ नेता हरीश रावत (हरदा) की ओर से आयोजित “फल पार्टी” भी नेताओं के बीच की खटास को दूर नहीं कर सकी। खुले निमंत्रण के बावजूद कई बड़े नेता इस आयोजन से नदारद रहे, जिससे पार्टी के भीतर मतभेद एक बार फिर उजागर हो गए।
फल पार्टी में नहीं दिखी एकजुटता
देहरादून स्थित अपने आवास पर आयोजित इस खास कार्यक्रम में हरीश रावत के समर्थक और कार्यकर्ता तो बड़ी संख्या में पहुंचे, लेकिन प्रदेश स्तर के कई वरिष्ठ नेता नजर नहीं आए।
फल पार्टी में तरबूज, खरबूज, ककड़ी जैसे मौसमी फलों के साथ पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन परोसे गए, लेकिन इनकी मिठास भी नेताओं के बीच की दूरी को कम नहीं कर सकी।
कौन-कौन नेता रहे अनुपस्थित
इस आयोजन से प्रदेश कांग्रेस के कई बड़े चेहरे दूर रहे, जिनमें शामिल हैं:
- गणेश गोदियाल (प्रदेश अध्यक्ष)
- यशपाल आर्य (नेता प्रतिपक्ष)
- प्रीतम सिंह (चुनाव अभियान समिति अध्यक्ष)
- हरक सिंह रावत (चुनाव प्रबंधन समिति अध्यक्ष)
बताया गया कि ये सभी नेता टिहरी में आयोजित पार्टी की रैली में व्यस्त थे, जिस कारण फल पार्टी में शामिल नहीं हो सके।
‘हरदा’ के अवकाश से बढ़ी सियासी हलचल
हरीश रावत के 15 दिन के अवकाश ने भी कांग्रेस में बयानबाजी को हवा दी है। 10 अप्रैल को उनका अवकाश पूरा हो चुका है, लेकिन अब तक उन्होंने सक्रिय राजनीति में वापसी को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है।
उन्होंने कहा कि 59 साल के राजनीतिक जीवन में पहली बार अवकाश लिया, लेकिन इसे अनावश्यक रूप से चर्चा का विषय बना दिया गया। आगे वे इस पर मंथन कर निर्णय लेंगे।
नेताओं की प्रतिक्रिया
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि “अपने लोगों को निमंत्रण नहीं दिया जाता। टिहरी में पार्टी की रैली थी, अगर वह नहीं होती तो हम भी फल पार्टी में जरूर जाते।”
वहीं हरीश रावत ने स्पष्ट किया कि यह एक गैर-राजनीतिक कार्यक्रम था, जिसका उद्देश्य उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों और संस्कृति को बढ़ावा देना है।
स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की पहल
फल पार्टी में सिर्फ मौसमी फल ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक चीजों को भी प्रमुखता दी गई। इसमें बुरांश और नींबू का जूस, जौनसार की टमाटर चटनी, भट्ट की चुटकानी, लाल भात और हरिद्वार का गुड़ शामिल था।
हरीश रावत ने बताया कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने राज्य के उत्पादों को बढ़ावा दिया और अब भी उसी दिशा में काम कर रहे हैं।
निष्कर्ष
फल पार्टी के बहाने एकजुटता दिखाने की कोशिश के बावजूद उत्तराखंड कांग्रेस में गुटबाजी साफ नजर आई। बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी ने यह संकेत दे दिया कि पार्टी के भीतर मतभेद अभी खत्म नहीं हुए हैं। आने वाले समय में यह खटास पार्टी की रणनीति और चुनावी तैयारियों को प्रभावित कर सकती है।


