देहरादून, 23 जून 2026
उत्तराखंड में मानसून की दस्तक के साथ ही राज्य सरकार ने संभावित पेयजल संकट को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। भारी बारिश, भूस्खलन, बादल फटने और नदी-नालों में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में जलापूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए शासन ने जल संस्थान और पेयजल निगम के लिए विस्तृत मानक प्रचालन कार्यविधि (एसओपी) जारी की है। इसमें सात पहाड़ी जिलों को अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, जहां मानसून के दौरान पेयजल योजनाओं को सबसे अधिक नुकसान पहुंचने की संभावना जताई गई है।
शासन द्वारा जारी एसओपी में कहा गया है कि उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण वर्षाकाल के दौरान पेयजल व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। अतिवृष्टि, भूस्खलन और बाढ़ के कारण कई बार जलस्रोत क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जबकि लंबी दूरी तक बिछी पेयजल पाइपलाइनें बह जाती हैं या मलबे में दब जाती हैं। इससे हजारों लोगों को पेयजल संकट का सामना करना पड़ता है।
पिछले तीन वर्षों के अनुभव और आंकड़ों के आधार पर शासन ने उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, पिथौरागढ़, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल और चंपावत जिलों को अति संवेदनशील श्रेणी में शामिल किया है। इन जिलों में मानसून के दौरान पेयजल योजनाओं को सबसे अधिक नुकसान होने की संभावना रहती है।
वहीं बागेश्वर और अल्मोड़ा को मध्यम संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। जबकि देहरादून, नैनीताल, ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार को कम संवेदनशील श्रेणी में शामिल किया गया है। हालांकि शासन ने स्पष्ट किया है कि सभी जिलों में समान रूप से सतर्कता बरती जाएगी और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तैयारी रखी जाएगी।
मानसून के दौरान आम जनता को पेयजल संकट से बचाने के लिए जल संस्थान और पेयजल निगम के अधिकारियों को चौबीसों घंटे अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए गए हैं। पेयजल सचिव रणवीर सिंह चौहान ने कहा है कि जारी एसओपी का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए और किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
एसओपी के तहत निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी क्षेत्र में पेयजल योजना क्षतिग्रस्त होती है तो उसकी तत्काल मरम्मत कर जलापूर्ति बहाल की जाए। इसके लिए प्रत्येक जिले में आवश्यक मानव संसाधन, तकनीकी टीम और मरम्मत सामग्री पहले से उपलब्ध रखी जाएगी ताकि आपदा की स्थिति में त्वरित कार्रवाई की जा सके।
शासन ने शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सोडियम हाइपोक्लोराइड, फिटकरी (एलम) और अन्य आवश्यक रसायनों का पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं। इसके अलावा जलस्रोतों की नियमित सफाई, निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण पर विशेष जोर दिया गया है।
आपदा प्रबंधन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से सभी जिलों में विशेष कंट्रोल रूम स्थापित किए जाएंगे। ये कंट्रोल रूम मानसून के दौरान जलापूर्ति से जुड़ी समस्याओं की निगरानी करेंगे और किसी भी आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करेंगे।
एसओपी में पेयजल स्रोतों की जीआईएस मैपिंग कराने और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर विशेष निगरानी रखने का भी प्रावधान किया गया है। शासन का मानना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से संकटग्रस्त क्षेत्रों तक तेजी से सहायता पहुंचाई जा सकेगी।
यदि किसी क्षेत्र में जलापूर्ति पूरी तरह बाधित हो जाती है तो वहां टैंकरों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी। इसके लिए जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
निष्कर्ष
मानसून के दौरान उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पेयजल संकट की आशंका को देखते हुए शासन की ओर से जारी एसओपी को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेष रूप से सात अति संवेदनशील जिलों में जलापूर्ति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए व्यापक तैयारी की गई है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारी बारिश और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद राज्य के किसी भी क्षेत्र में लोगों को पेयजल के लिए परेशानी का सामना न करना पड़े और आपूर्ति व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित होती रहे।


