देहरादून | 29 जून 2026
उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए वन विभाग ने नई रणनीति तैयार की है। इस योजना के तहत कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से पांच बाघों को राजाजी के पश्चिमी क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाएगा। खास बात यह है कि इस बार ट्रांसलोकेशन की प्रक्रिया पहले की तरह लंबे अंतराल में नहीं होगी, बल्कि एक से दो वर्षों के भीतर सभी पांच बाघों को चरणबद्ध तरीके से राजाजी पहुंचाने की योजना बनाई गई है। इससे पश्चिमी क्षेत्र में बाघों की आबादी तेजी से बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
वन अधिकारियों के अनुसार, राजाजी टाइगर रिजर्व का पश्चिमी हिस्सा लंबे समय से बाघों की कम संख्या की चुनौती से जूझ रहा है। इसी समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2020 से कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से बाघों का स्थानांतरण शुरू किया गया था। वर्ष 2020 से 2025 के बीच कुल पांच बाघों को यहां लाया गया, लेकिन यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चली और औसतन एक वर्ष में केवल एक बाघ का ही सफल ट्रांसलोकेशन हो पाया।
अब वन विभाग ने इस प्रक्रिया में बदलाव करते हुए समय अंतराल कम करने का निर्णय लिया है। राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसे के अनुसार आगामी चरण में कॉर्बेट से पांच और बाघों को एक से दो वर्षों के भीतर राजाजी टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित किया जाएगा। इससे बाघों की संख्या में तेजी से वृद्धि होगी और उनके प्राकृतिक प्रजनन की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।
हाल ही में राजस्थान के अलवर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने ‘रीइंट्रोडक्शन एंड पॉपुलेशन रिकवरी ऑफ टाइगर इन इंडिया’ रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में राजाजी टाइगर रिजर्व में चल रहे बाघ पुनर्स्थापन (रीइंट्रोडक्शन) कार्यक्रम को देश के सफल संरक्षण मॉडलों में शामिल किया गया है।
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि एक समय राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी हिस्से में केवल दो बाघिनें ही बची थीं, जिससे वहां बाघों के प्राकृतिक विस्तार पर संकट पैदा हो गया था। ऐसे में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से बाघों का स्थानांतरण कर इस क्षेत्र में बाघों की आबादी को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से बाघों की वापसी संभव नहीं होती, वहां वैज्ञानिक तरीके से ट्रांसलोकेशन प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है।
अलवर में ही केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने ‘रोड मैप फॉर एक्टिव मैनेजमेंट ऑफ टाइगर इन इंडिया-2026’ भी जारी किया। इस दस्तावेज में देशभर में बाघ संरक्षण की भविष्य की रणनीति, उनके प्राकृतिक आवास के विकास, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने, जनसहभागिता बढ़ाने और वैज्ञानिक प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुसार नई रणनीति का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित और उपयुक्त आवास तैयार करना भी है। इसके तहत जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करने, वन्यजीव गलियारों (कॉरिडोर) को संरक्षित करने तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा।
वन विभाग का मानना है कि यदि नई योजना निर्धारित समय के अनुसार सफल होती है तो राजाजी टाइगर रिजर्व का पश्चिमी क्षेत्र भी पूर्वी हिस्से की तरह बाघों की स्थायी और स्वस्थ आबादी वाला क्षेत्र बन सकेगा। इससे उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण को नई मजबूती मिलेगी और प्रदेश की जैव विविधता को भी दीर्घकालिक लाभ होगा।
निष्कर्ष
राजाजी टाइगर रिजर्व में कॉर्बेट से पांच बाघों के शीघ्र ट्रांसलोकेशन की नई योजना उत्तराखंड में बाघ संरक्षण अभियान के लिए महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। कम समय में अधिक बाघों को स्थानांतरित करने की रणनीति से पश्चिमी क्षेत्र में बाघों की आबादी बढ़ने की उम्मीद है। यदि यह योजना सफल रहती है, तो राजाजी टाइगर रिजर्व देश में वैज्ञानिक वन्यजीव संरक्षण और पुनर्स्थापन का एक और सफल उदाहरण बनकर उभर सकता है।


