स्थान: हरिद्वार, उत्तराखंड
तारीख: 30 जुलाई 2026
धर्मनगरी हरिद्वार में कांवड़ यात्रा के साथ आस्था, भक्ति और सेवा के अनूठे रंग दिखाई देने लगे हैं। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु अलग-अलग अंदाज में भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं, लेकिन इस बार दो ऐसी कांवड़ यात्राओं ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। एक ओर दिल्ली से आए शिवभक्त की असली नोटों से सजी कांवड़ आकर्षण का केंद्र बनी, तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के बागपत से आए दो भाइयों ने अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर गंगाजल लेने पहुंचकर मातृ-पितृ सेवा का अनूठा संदेश दिया।
असली नोटों से सजी कांवड़ ने खींचा श्रद्धालुओं का ध्यान
दिल्ली के हर्ष विहार निवासी शिवभक्त दीपांशु अपने नौ साथियों के साथ हरिद्वार पहुंचे। उन्होंने इस बार अपनी कांवड़ को 10, 20, 50 और 100 रुपये के असली नोटों से सजाया, जिसे देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती रही।
दीपांशु ने बताया कि पिछले वर्ष की कांवड़ यात्रा के दौरान उनके मन में इस तरह की कांवड़ बनाने का विचार आया था। इस वर्ष उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करते हुए विशेष रूप से नोटों से सजी कांवड़ तैयार कराई और हरकी पैड़ी से गंगाजल भरकर दिल्ली के लिए रवाना हुए।
नोटों की गिनती नहीं, श्रद्धा सबसे बड़ी
दीपांशु ने बताया कि कांवड़ में कितनी राशि के नोट लगाए गए हैं, इसका उन्होंने कोई हिसाब नहीं रखा। जितने नोट उपलब्ध होते गए, उन्हें कांवड़ पर सजाया जाता गया। बारिश से नोट खराब न हों, इसके लिए पूरी कांवड़ को पारदर्शी सुरक्षा पन्नी से ढक दिया गया।
उन्होंने कहा कि दिल्ली पहुंचने के बाद कांवड़ से सभी नोट उतारकर उन्हें भगवान शिव के मंदिर में दान कर दिया जाएगा। इन पैसों का उपयोग भंडारे के आयोजन या जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए किया जाएगा।
नौ लोगों ने दिन-रात मेहनत कर तैयार की विशेष कांवड़
दीपांशु के साथी तरुण ने बताया कि इस विशेष कांवड़ को तैयार करने में नौ लोगों ने लगातार एक दिन और एक रात मेहनत की। उनका कहना था कि इस बार कोई विशेष मनोकामना नहीं थी, बल्कि शिवभक्ति को एक अलग रूप में प्रस्तुत करने की इच्छा थी।
दीपांशु ने यह भी कहा कि यदि भगवान शिव उनकी मनोकामना पूरी करते हैं, तो अगले वर्ष इससे भी बड़ी और अधिक नोटों से सजी कांवड़ लेकर हरिद्वार आएंगे।
माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर पेश की सेवा और सम्मान की मिसाल
कांवड़ यात्रा के दौरान आस्था का एक और भावुक दृश्य देखने को मिला। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के ग्राम चिरचिट निवासी दो सगे भाई संजीव कुमार और अनिल कुमार अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार पहुंचे।
दोनों भाइयों ने हरकी पैड़ी से गंगाजल भरने के बाद अपने पिता वेदराम और माता राजेंद्र को कांवड़ में बैठाकर लगभग 200 किलोमीटर की पैदल यात्रा के लिए बागपत की ओर प्रस्थान किया।
“माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म”
संजीव और अनिल ने बताया कि उनकी कोई व्यक्तिगत मनोकामना नहीं है। उनका मानना है कि माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और उनके आशीर्वाद से जीवन की हर मंजिल आसान हो जाती है।
उन्होंने कहा कि यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने माता-पिता का सम्मान और सेवा करे तो यही सबसे बड़ी पूजा होगी। दोनों भाई पूरे रास्ते कंधों पर कांवड़ उठाकर अपने माता-पिता को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाएंगे और वहां भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे।
कांवड़ मेले में बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या
हरिद्वार में कांवड़ मेले की औपचारिक शुरुआत 30 जुलाई से हो रही है, लेकिन उससे पहले ही देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मनगरी पहुंचने लगे हैं। हरकी पैड़ी और प्रमुख घाटों पर शिवभक्तों की भीड़ लगातार बढ़ रही है। प्रशासन भी सुरक्षा, यातायात और सुविधाओं को लेकर पूरी तरह सतर्क है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
निष्कर्ष
हरिद्वार की कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और सामाजिक संदेशों का भी सशक्त माध्यम बनती जा रही है। जहां नोटों से सजी कांवड़ ने श्रद्धा की अनूठी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की, वहीं माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर यात्रा करने वाले दो भाइयों ने भारतीय संस्कृति में मातृ-पितृ सेवा के महत्व को जीवंत कर दिया। ऐसे प्रेरणादायक दृश्य कांवड़ यात्रा को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और संस्कारों का उत्सव भी बनाते हैं।




