देहरादून | 19 सितंबर 2026
देहरादून: गणेश उत्सव को लेकर देहरादून में इस बार एक अलग तस्वीर देखने को मिल रही है। कई परिवारों और धार्मिक संगठनों ने गणपति की प्रतिमा स्थापित करने के बाद विसर्जन करने के बजाय उन्हें घर या मंदिर में स्थायी रूप से विराजमान रखने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही मिट्टी की प्रतिमा, कृत्रिम जलकुंड में प्रतीकात्मक विसर्जन और नियमित पूजा जैसे विकल्प भी अपनाए जा रहे हैं।
विसर्जन के बजाय स्थायी स्थापना की ओर बढ़ रहे परिवार
देहरादून की पहाड़ी संस्कृति में घर के प्रवेश द्वार या खोली के ऊपर गणेशजी की स्थापना की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इस परंपरा में गणपति को घर के मंगलकर्ता और रक्षक के रूप में स्थायी रूप से पूजने की मान्यता रही है।
इसी स्थानीय परंपरा को ध्यान में रखते हुए इस बार दून में कुछ परिवार और धार्मिक संस्थाएं गणेश प्रतिमा का विसर्जन न कर उन्हें घर या मंदिर में ही स्थापित रखकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। दीपलोक कॉलोनी स्थित श्रीराम मंदिर समेत कुछ स्थानों पर मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करने और कृत्रिम जलकुंड में प्रतीकात्मक विसर्जन जैसे विकल्प अपनाए जा रहे हैं।
‘विसर्जन नहीं, पूजा और महोत्सव’ का अभियान
पटेलनगर स्थित गणपति महोत्सव समिति ने इस वर्ष ‘विसर्जन नहीं करेंगे, सिर्फ पूजा होगी और महोत्सव मनाएंगे’ अभियान शुरू किया है। समिति के अध्यक्ष तेजेंद्र हरजाई के अनुसार देवभूमि में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा नहीं रही है।
समिति की इस पहल को लोगों का समर्थन मिलने की बात कही गई है। हरिद्वार और रुड़की के कुछ धार्मिक संगठनों ने भी गणपति विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया है।
परम विहार में 11 साल से चल रहे आयोजन का बदला स्वरूप
परम विहार स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर में भी गणेश उत्सव को लेकर परंपरा में बदलाव देखने को मिला है। मंदिर के पुजारी पंडित विनोद बंगवाल ने बताया कि यहां पिछले 11 वर्षों से गणेश उत्सव का आयोजन किया जा रहा था।
उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष आयोजकों ने उत्तराखंड की स्थानीय परंपराओं को ध्यान में रखते हुए गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया था। इसी कारण इस वर्ष नया आयोजन नहीं किया गया। मंदिर में पहले से स्थापित गणेशजी की प्रतिमा की नियमित पूजा-अर्चना जारी है।
नेहरू कॉलोनी मंदिर में भी नहीं होता विसर्जन
श्री सनातन धर्म मंदिर, नेहरू कॉलोनी के पंडित दीनबंधु तिवारी के अनुसार मंदिर में स्थापित गणेशजी की प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता। उनका कहना है कि उत्तराखंड में गणेशजी की पूजा की परंपरा रही है और इसी धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रतिमा को मंदिर में ही विराजमान रखकर पूजा की जाती है।
पहाड़ी घरों में स्थायी रूप से विराजते हैं गणेशजी
उत्तराखंड विद्वत सभा के प्रवक्ता आचार्य बिपिन डोभाल के अनुसार सार्वजनिक रूप से गणेश उत्सव मनाने और प्रतिमा विसर्जन की परंपरा उत्तराखंड की पारंपरिक पर्वतीय संस्कृति का पुराना हिस्सा नहीं रही है।
उनके मुताबिक पहाड़ के पारंपरिक घरों में खोली के ऊपर गणेशजी की स्थायी स्थापना की परंपरा रही है। वहीं महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में गणेश उत्सव और विसर्जन की अलग धार्मिक एवं सामाजिक परंपराएं हैं।
आचार्य डोभाल के अनुसार उत्तराखंड में सार्वजनिक गणेश उत्सव और विसर्जन की परंपरा पिछले कुछ दशकों में अधिक प्रचलित हुई है। पौराणिक संदर्भों में बदरीकाश्रम में व्यास द्वारा महाभारत की रचना और गणेशजी द्वारा उसे लिखे जाने का उल्लेख भी मिलता है। उनका कहना है कि उद्देश्य किसी परंपरा का विरोध करना नहीं, बल्कि देवभूमि की स्थानीय धार्मिक परंपराओं और लोकाचार को समझना है।
गणेशजी के साथ रिद्धि-सिद्धि को घर में रखने की मान्यता
बदरीकाश्रम ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य पीठ व्यास के आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं के अनुसार यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में गणेश-लक्ष्मी का आह्वान कर उन्हें घर में विराजमान रखने की कामना की जाती है।
उनके धार्मिक मत के अनुसार गणेशजी के साथ रिद्धि-सिद्धि और लाभ, बुद्धि, क्षेम तथा सिद्धि की अवधारणाएं जुड़ी हुई हैं। इसी आधार पर उनका कहना है कि गणेशजी की प्रतिमा को विसर्जित करने के बजाय उनकी निरंतर पूजा की जा सकती है।
वह गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक की परंपरा को बदरीकाश्रम और महाभारत से जुड़े प्रसंगों से भी जोड़ते हैं।
निष्कर्ष
देहरादून में गणेश उत्सव के दौरान इस बार पूजा और प्रतिमा स्थापना को लेकर स्थानीय धार्मिक परंपराओं पर चर्चा तेज हुई है। कुछ परिवारों और संस्थाओं ने विसर्जन के बजाय गणपति को घर या मंदिर में स्थायी रूप से विराजमान रखने का रास्ता चुना है। इससे गणेश उत्सव के आधुनिक सार्वजनिक स्वरूप के साथ उत्तराखंड की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं को लेकर भी नई चर्चा सामने आई है।


