देहरादून | 12 जुलाई 2025
मसूरी में ट्रैफिक जाम में फंसने के कारण एक बुजुर्ग पर्यटक की मौत का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस दर्दनाक घटना को मानवाधिकार हनन मानते हुए स्वतः संज्ञान लिया है और प्रमुख सचिव (गृह) तथा पुलिस महानिदेशक से 2 सितंबर तक विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
क्या है मामला?
7 जून को दिल्ली से मसूरी घूमने आए 62 वर्षीय कमल किशोर की अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। परिजनों ने तुरंत एंबुलेंस बुलाई, लेकिन देहरादून से मसूरी तक फैले भारी ट्रैफिक जाम के कारण एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच सकी। परिजनों ने एक वैकल्पिक वाहन से बुजुर्ग को अस्पताल ले जाने की कोशिश की, लेकिन वह भी करीब 45 मिनट तक जाम में फंसा रहा।
जब तक मरीज अस्पताल पहुंचा, काफी देर हो चुकी थी और कमल किशोर ने दम तोड़ दिया।
आयोग की सख्त टिप्पणी
राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य गिरधर सिंह धर्मशक्तू ने आदेश में कहा:
“उत्तराखंड में ट्रैफिक जाम की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। यह न केवल आमजन, बल्कि पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के जीवन को भी सीधा खतरे में डाल रही है। वर्षों से यह समस्या जस की तस बनी हुई है, जिसका निदान न होना अत्यंत चिंताजनक है। यह घटना आम नागरिक के मौलिक मानवाधिकारों के हनन की श्रेणी में आती है।”
कानूनी पहल और शिकायत
देहरादून के अधिवक्ता मोहम्मद आशिक ने आयोग को इस मामले में लिखित शिकायत सौंपी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन ने मसूरी जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं और ट्रैफिक प्रबंधन पर गंभीरता नहीं दिखाई है। उन्होंने लिखा:
“अगर अब भी कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले समय में और जानें ट्रैफिक जाम में फंसकर जाती रहेंगी।”
सवालों के घेरे में सिस्टम:
- क्या मसूरी जैसे पर्यटन केंद्रों में पर्याप्त एंबुलेंस और मेडिकल रिस्पॉन्स यूनिट हैं?
- ट्रैफिक जाम के हालात से कैसे निपटा जा रहा है?
- क्या सरकार पर्यटकों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर है?
आयोग की मांग:
आयोग ने साफ किया है कि संबंधित अधिकारियों को दो सितंबर 2025 तक स्पष्टीकरण और कार्रवाई रिपोर्ट सौंपनी होगी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया जाए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कौन-से कदम उठाए जा रहे हैं।
निष्कर्ष:
मसूरी में जाम के कारण हुई मौत अब राज्यव्यापी बहस का विषय बन गई है। यह मामला केवल ट्रैफिक प्रबंधन की विफलता नहीं, बल्कि एक जीवन के अनमोल अधिकार की अनदेखी है। अब देखना होगा कि सरकार इस पर कितनी गंभीरता से काम करती है।


