स्थान: हरिद्वार, उत्तराखंड
तारीख: 14 जुलाई 2025
सावन की भक्ति में डूबे शिवभक्तों को संतों, चिकित्सकों और महंतों ने दिया एक गहन संदेश:
“महादेव भाव के भूखे हैं, भार के नहीं।”
कांवड़ यात्रा 2025 में भारी गंगाजल ढोने की प्रतिस्पर्धा को लेकर चिंता जताई गई है। हरिद्वार से लेकर विभिन्न तीर्थ क्षेत्रों में संतों और विशेषज्ञों ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि शिव भक्ति में ‘शक्ति प्रदर्शन’ का दिखावा न करें।
भक्ति में होड़ नहीं, श्रद्धा में सरलता हो
पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप तेजी से बदला है। कुछ युवा अब 10 से 15 लीटर नहीं, बल्कि 100-200 लीटर तक गंगाजल कंधों पर उठाकर लंबी दूरी तय कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति अब केवल श्रद्धा नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा का रूप लेती जा रही है।
संतों की चेतावनी: महादेव को भाव चाहिए, बोझ नहीं
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राज्य राजेश्वराश्रम महाराज (कनखल, हरिद्वार)
“गंगा मां नहीं चाहेंगी कि उनका पुत्र खुद को कष्ट में डाले। महादेव एक लोटा जल और सच्चे भाव से प्रसन्न होते हैं। श्रद्धा को दिखावे का रंग मत दीजिए।”
महामंडलेश्वर स्वामी ललितानंद गिरी (महंत, भारत माता मंदिर)
“कांवड़ यात्रा शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं है। यह आस्था और संयम का पर्व है। जल उठाएं लेकिन अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही।”
श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज (अध्यक्ष, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद)
“डेढ़-दो क्विंटल जल उठाकर 10 कदम चलकर रुक जाना तप नहीं है। यह सिर्फ जोखिम है। शांति और मर्यादा से यात्रा करें, तभी महादेव प्रसन्न होंगे।”
चिकित्सकों की राय: जोखिम भरा है जरूरत से ज्यादा भार उठाना
डॉ. संजय सिंह
विभागाध्यक्ष, रोग निदान विभाग, उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय
“जो लोग नियमित भार नहीं उठाते, उनके लिए भारी गंगाजल ढोना जानलेवा हो सकता है। इससे रीढ़, कंधों और तंत्रिका तंत्र में गंभीर दिक्कतें हो सकती हैं। आयुर्वेद ग्रंथों में भी क्षमता से अधिक भार उठाने की मनाही है।”
कांवड़ियों से अपील:
- शिव को जल चढ़ाना भाव की बात है, न कि मात्रा की।
- एक बूंद जल भी यदि सच्चे मन से अर्पित हो, तो वह हजारों लीटर के बराबर होता है।
- अपनी और दूसरों की सुरक्षा का ध्यान रखें।
- कांवड़ हर जगह रखने से उसकी पवित्रता प्रभावित होती है। मर्यादा बनाए रखें।
सार: धर्म का मतलब सादगी और संतुलन है
कांवड़ यात्रा सांस्कृतिक उत्सव और आत्मशुद्धि का माध्यम है, न कि शारीरिक क्षमताओं का प्रदर्शन।
महादेव को केवल जल की धार नहीं चाहिए, मन की निर्मलता चाहिए।
श्रद्धा से भरा एक लोटा गंगाजल महादेव को उतना ही प्रिय है जितना विशाल जलराशि।


