तारीख: 11 नवंबर 2025
स्थान: देहरादून
एक साल पहले की वह रात जिसने दून को दहला दिया
11 नवंबर 2024 की रात, घड़ी की सुइयां जब 1 बजकर 19 मिनट पर टिक रही थीं, देहरादून का ONGC चौक एक ऐसी चीख सुनने वाला था जिसे शहर आज तक भूल नहीं पाया।
सुनसान सड़क, सामने से मुड़ता एक खटारा कंटेनर, और तेज रफ्तार में आती एक कार। टक्कर इतनी भीषण कि कुछ ही सेकंड में सात दोस्तों की जिंदगी अंधेरे में डूब गई।
एक साल बाद… कंटेनर जस का तस, कार का हिस्सा अब भी चिपका
एक वर्ष बीत चुका है, लेकिन सर्किट हाउस चौकी परिसर में खड़ा वही कंटेनर आज भी अपने पीछे चिपके कार के हिस्से के साथ एक सवाल की तरह खड़ा है।
पुलिस की विवेचना मानो उसी रात की तरह थमी पड़ी है। न चार्जशीट अदालत पहुंची, न जवाबदेही तय हुई।
हृदयविदारक दृश्य जिसने जांचकर्ताओं तक को हिला दिया
हादसा ऐसा था कि कार में बैठे सात में से छह दोस्त चीख तक न निकाल सके।
150 मीटर तक सड़क पर बिखरे रहे
सिर, हाथ, धड़…
एक भयानक खामोशी, जिसमें सिर्फ एक आवाज बची — घायल सिद्धेश अग्रवाल की सिसकन।
एक राहगीर ने उसे कार में फंसा देखकर पुलिस और एंबुलेंस को सूचना दी, और सिद्धेश ही उस रात का अकेला जीवित गवाह बना।
हादसे से पहले की आखिरी यात्रा: शहर की सड़कों पर घूमते हुए मौत की ओर बढ़ते कदम
उनकी यात्रा राजपुर रोड से शुरू हुई थी।
घंटाघर, वाडिया इंस्टीट्यूट, बल्लभगढ़ चौक, गोविंदगढ़ मोड़ और जीएमएस रोड होते हुए वे आगे बढ़ते गए।
लक्ष्मण चौक से यू-टर्न लेकर वे फिर जीएमएस रोड पर आए और फिर बल्लूपुर की ओर।
अचानक सामने दिखी एक कार… और उनकी अपनी कार की रफ्तार बढ़ गई। कुछ ही मिनट बाद ONGC चौक पर सब खत्म हो गया।
12 दिन की खोज के बाद मिला कंटेनर चालक
पुलिस ने 12 दिन की जांच के बाद कंटेनर चालक रामकुमार को गिरफ्तार किया।
सिद्धेश के पिता की शिकायत पर कैंट थाने में मुकदमा दर्ज हुआ, लेकिन आगे की कार्यवाही धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चली गई।
चार्जशीट अभी तक दाखिल नहीं, पुलिस के पास बस आश्वासन
लंबे समय तक कहा गया कि सिद्धेश गंभीर स्थिति में था और बयान नहीं दे पा रहा था, इसलिए विवेचना रुकी रही।
अब कैंट थाना प्रभारी कमल कुमार लुंठी का कहना है कि
चार्जशीट जल्द दाखिल की जाएगी।
लेकिन पीड़ित परिवारों का भरोसा इस बीच चकनाचूर हो चुका है।
कामाक्षी के पिता ने भी दर्ज कराना चाहा मुकदमा, जवाबदेही पर सवाल कायम
हादसे में मारी गई कामाक्षी के पिता, अधिवक्ता तुषार सिंघल, भी अलग मुकदमा दर्ज करना चाहते थे।
उन्हें बताया गया कि एक ही घटना में दूसरा मुकदमा दर्ज नहीं हो सकता।
उन्होंने न्यायालय में अर्ज़ी लगाई और कोर्ट ने निर्देश दिया कि उनकी शिकायत मौजूदा केस में शामिल की जाए।
अधिवक्ता सिंघल अब भी पूछ रहे हैं:
“ऐसा खटारा कंटेनर सड़क पर किसकी अनुमति से चल रहा था? कौन जिम्मेदार है?”
उन्होंने कहा कि वे इस मामले को अंत तक ले जाएंगे और संबंधित अधिकारियों को भी जवाबदेही के दायरे में लाएंगे।
निष्कर्ष: एक साल बीता, दर्द और सवाल जस के तस
देहरादून का यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं था, एक चेतावनी थी…
लेकिन जांच की सुस्त रफ्तार ने परिवारों के घाव और गहरे कर दिए।
आज भी छह परिवार न्याय की प्रतीक्षा में खड़े हैं,
और सर्किट हाउस में खड़ा कंटेनर इस इंतजार का सन्नाटा बन चुका है।


