तारीख: 12 नवम्बर 2025 | स्थान: देहरादून (उत्तराखंड)
दिल्ली ब्लास्ट की जांच में उत्तराखंड फिर चर्चा में
दिल्ली में हाल ही में हुए ब्लास्ट के बाद देश की खुफिया एजेंसियां आतंकियों के नेटवर्क की तह तक पहुंचने में जुटी हैं। जांच के सिलसिले में एक बार फिर उत्तराखंड का नाम सामने आया है।
पिछले कई दशकों से यह राज्य भले ही सीधे तौर पर किसी बड़ी आतंकी वारदात से प्रभावित नहीं रहा, लेकिन आतंकियों के कदमों के निशान यहां तक बार-बार पहुंचते रहे हैं।
देवभूमि पर आतंकियों की छाया — सुरागों ने कई बार यहां तक पहुंचाई एजेंसियां
सुरक्षा एजेंसियों के लिए उत्तराखंड कई बार वह जगह बना जहां आतंकियों ने या तो छिपने की कोशिश की, या नेटवर्क चलाने की।
1980 और 1990 के दशक में खालिस्तान आंदोलन के दौर में ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में आतंकियों की सक्रियता देखी गई। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने उस दौरान कई अभियानों के जरिए नेटवर्क ध्वस्त किया। पंजाब पुलिस ने भी स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर यहां कई संयुक्त ऑपरेशन चलाए।
2015 में पकड़ा गया था मास्टरमाइंड परमिंदर उर्फ ‘पेंदा’
साल 2015 में देहरादून पुलिस ने बड़ी सफलता हासिल की थी। नाभा जेल ब्रेक के मास्टरमाइंड परमिंदर उर्फ पेंदा को उसके साथी के साथ दबोचा गया। बताया गया कि यह गैंग कुछ समय से देहरादून में छिपा हुआ था। इस घटना के बाद से सुरक्षा एजेंसियों ने उत्तराखंड में निगरानी और खुफिया तंत्र को और मजबूत किया।
हरिद्वार-रुड़की बेल्ट में भी कई बार आतंकियों की मौजूदगी के संकेत
गढ़वाल क्षेत्र के हरिद्वार और रुड़की इलाके में भी बीते वर्षों में केंद्रीय एजेंसियां कई बार आतंकियों और उनके नेटवर्क का पीछा करते हुए पहुंची थीं।
वर्ष 2016 में हरिद्वार में चल रहे अर्धकुंभ मेले के दौरान आईएसआईएस से जुड़े चार संदिग्ध आतंकवादी पकड़े गए थे। एनआईए और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर यह बड़ी कार्रवाई की थी। कहा गया था कि ये आतंकी मेले के दौरान किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने की फिराक में थे।
खुफिया तंत्र की पैनी नजर — उत्तराखंड को शरणस्थली नहीं बनने देंगे
उत्तराखंड पुलिस अब पूरी सतर्कता के साथ काम कर रही है। राज्य के पुलिस अधिकारी केंद्र की सुरक्षा एजेंसियों और इंटेलिजेंस नेटवर्क के साथ लगातार समन्वय में हैं।
राज्य पुलिस का कहना है कि उत्तराखंड को किसी भी सूरत में देशविरोधी तत्वों की शरणस्थली नहीं बनने दिया जाएगा।
कब-कब पकड़े गए संदिग्ध आतंकी – एक नजर टाइमलाइन पर
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06 फरवरी 2018: लश्कर-ए-तैयबा नेटवर्क से जुड़े संदिग्ध अब्दुल समद को गिरफ्तार किया गया, जो हवाला के जरिए धन जुटा रहा था।
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20 अप्रैल 2018: यूपी एटीएस ने डीडीहाट से रमेश सिंह कन्याल को पकड़ा, जो आईएसआई को जानकारी भेजने के आरोप में था।
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10 सितंबर 2018: ऊधमसिंह नगर पुलिस ने खालिस्तानी मूवमेंट से जुड़े दो लोगों को सोशल मीडिया पर प्रचार करते पकड़ा।
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17 सितंबर 2018: धारचूला से एक संदिग्ध गिरफ्तार, जो तत्कालीन रक्षामंत्री की हत्या की साजिश रच रहा था।
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06 जून 2019: ऊधमसिंह नगर से हरचरण सिंह, बब्बर खालसा इंटरनेशनल के लिए हथियार सप्लाई करने के आरोप में गिरफ्तार।
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21 जुलाई 2019: नैनीताल पुलिस ने खालिस्तानी विचारधारा से जुड़े 52 लोगों की जांच शुरू की।
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01 फरवरी 2020: रुड़की से आशीष सिंह, खालिस्तानी लिबरेशन फोर्स का सदस्य गिरफ्तार।
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03 नवम्बर 2022: यूपी एटीएस और उत्तराखंड एसटीएफ ने मिलकर गजवा-ए-हिंद मॉड्यूल से जुड़े एक संदिग्ध को ज्वालापुर से गिरफ्तार किया।
निष्कर्ष
दिल्ली ब्लास्ट की जांच ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि आतंकी संगठन अब सीमाओं में नहीं बंधे हैं। उत्तराखंड जैसी शांत और पहाड़ी सीमाओं वाले राज्यों का उपयोग वे छिपने या नेटवर्क बनाने के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में करने की कोशिश करते हैं।
हालांकि, राज्य की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों की सजगता के चलते अब उत्तराखंड ऐसे किसी भी नेटवर्क के लिए ‘नो-गो ज़ोन’ बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
देश की सुरक्षा व्यवस्था में उत्तराखंड अब न केवल सतर्क प्रहरी की भूमिका निभा रहा है, बल्कि आतंकवाद विरोधी तंत्र का एक अहम हिस्सा बन चुका है।


