देहरादून | 10 जनवरी 2026
साल 2026 के पहले प्रमुख पर्व मकर संक्रांति को लेकर इस बार धार्मिक परंपराओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 14 जनवरी 2026 को पड़ने वाली मकर संक्रांति के दिन षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो करीब 19 वर्षों बाद आया है। एकादशी तिथि होने के कारण इस दिन चावल से बनी किसी भी सामग्री का प्रयोग वर्जित रहेगा, ऐसे में परंपरागत रूप से बनने वाली खिचड़ी इस बार नहीं बनाई जाएगी।
मकर संक्रांति आमतौर पर उल्लास और सामाजिक भोज के साथ मनाई जाती है, लेकिन इस बार तिथि संयोग के चलते पर्व मनाने के तरीकों को लेकर लोगों में भ्रम है। कोई अगले दिन खिचड़ी बनाने की बात कर रहा है तो कोई बिना खिचड़ी ही संक्रांति मनाने का निर्णय ले रहा है। इससे पहले भी बीते वर्षों में कई पर्व दो-दो दिन मनाने पड़े, और अब वर्ष की शुरुआत में ही यह संशय सामने आ गया है।
श्री बुद्धिबल्लभ पंचांग के संपादक आचार्य पवन पाठक के अनुसार, 14 जनवरी को दोपहर 3:07 बजे सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करेंगे, इसी क्षण से मकर संक्रांति का पुण्यकाल माना जाएगा। वहीं, षटतिला एकादशी तिथि 14 जनवरी की सुबह 3:18 बजे से शाम 5:53 बजे तक रहेगी। चूंकि एकादशी पर चावल का सेवन निषिद्ध होता है, इसलिए इस दिन खिचड़ी नहीं बनाई जाएगी। श्रद्धालु चाहें तो 15 जनवरी को खिचड़ी बना सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी का विशेष महत्व है, लेकिन इस बार विकल्प के रूप में तिल से बनी सामग्री या साबूदाने की खिचड़ी बनाई जा सकेगी। आचार्य पवन पाठक ने बताया कि मकर संक्रांति पर पवित्र स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। साथ ही तिल, घी और कंबल का दान करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। एकादशी होने के कारण भगवान को श्वेत तिल अर्पित किए जा सकते हैं।
मकर संक्रांति से शुभ कार्य भी नहीं होंगे शुरू
इस बार मकर संक्रांति के साथ शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी नहीं हो पाएगी। ज्योतिषाचार्य डॉ. सुशांत राज के अनुसार, इस समय शुक्र ग्रह अस्त अवस्था में हैं, जिसके कारण विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य स्थगित रहेंगे। 2 फरवरी 2026 को शुक्र उदय होने के बाद ही शुभ कार्यों की शुरुआत संभव होगी।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति 2026 इस बार आस्था और संयम का पर्व बनकर सामने आ रही है। षटतिला एकादशी के दुर्लभ संयोग के कारण जहां खिचड़ी नहीं बनेगी, वहीं शुभ कार्यों पर भी विराम रहेगा। हालांकि स्नान, दान और तिल से जुड़ी परंपराओं के माध्यम से श्रद्धालु पुण्य लाभ अर्जित कर सकेंगे। धार्मिक जानकारों का मानना है कि तिथि की मर्यादा का पालन करते हुए पर्व मनाना ही सबसे श्रेष्ठ और फलदायी मार्ग है।


