त्यूणी (देहरादून) | 10 जनवरी 2026
जौनसार-बावर की समृद्ध लोक संस्कृति का प्रतीक माघ मरोज पर्व शुक्रवार को विधि-विधान के साथ प्रारंभ हो गया। कयलू मंदिर, हनोल में चुराच का पहला बकरा चढ़ाने की परंपरा के साथ ही इस एक माह तक चलने वाले लोक उत्सव का शुभारंभ हुआ। पर्व के शुरू होते ही पूरे क्षेत्र में उत्सव और पारंपरिक उल्लास का माहौल बन गया है।
माघ मरोज पर्व के दौरान जौनसार-बावर क्षेत्र की 39 खतों में अतिथि सत्कार, सहभोज और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पंचायती आंगन लोकगीतों और लोकनृत्यों से गूंजेंगे। यह पर्व केवल जौनसार-बावर तक सीमित नहीं है, बल्कि टोंस और यमुना घाटी के पर्वतीय क्षेत्रों के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश के सिरमौर तक पूरे उत्साह से मनाया जाता है।
स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, पौष माह की 26वीं तिथि को चुराच का बकरा चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। माना जाता है कि इस विधि से क्षेत्र में सुख-समृद्धि और सामाजिक सौहार्द बना रहता है। पर्व के दौरान लोग अपने रिश्तेदारों और परिचितों को घरों में आमंत्रित कर पारंपरिक व्यंजनों के साथ आतिथ्य निभाते हैं।
माघ मरोज पर्व के माध्यम से लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। सहभोज और लोकनृत्य के जरिए नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं, लोक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जाता है। जौनसार-बावर के साथ-साथ उत्तरकाशी जनपद के बंगाण क्षेत्र, रवांई घाटी के जौनपुर और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में भी यह पर्व परंपरागत रूप से मनाया जाता है।
11 खतों में आज मनाया जाएगा किसराट पर्व
माघ मरोज के अंतर्गत शनिवार को बावर-देवघार क्षेत्र से जुड़ी 11 खतों में किसराट लोक पर्व मनाया जाएगा। वहीं जौनसार-बावर की अन्य खतों में रविवार और सोमवार को पारंपरिक लोक उत्सव का जश्न शुरू होगा।
किसराट पर्व के दिन घर-घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। सुबह के भोजन में लाल चावल और उड़द की खिचड़ी, जिसे स्थानीय भाषा में मशियाड़ा भात कहा जाता है, तैयार की जाती है। इसे अखरोट, भंगजीरा, तिल और घी के साथ परोसा जाता है। वहीं शाम के भोजन में पहाड़ी लाल चावल, रोटियां और बकरे का मीट पारंपरिक रूप से परोसा जाता है।
निष्कर्ष
माघ मरोज पर्व जौनसार-बावर की लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और अतिथि सत्कार की परंपरा का जीवंत प्रतीक है। कयलू मंदिर में चुराच का पहला बकरा चढ़ने के साथ शुरू हुआ यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम भी है। एक माह तक चलने वाला यह पर्व लोक जीवन में उत्साह, मेल-जोल और सांस्कृतिक चेतना का संचार करता है।


