देहरादून | 22 जनवरी 2026
देहरादून की अदालत ने पांच साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म कर उसकी हत्या करने के जघन्य मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने दोषी चुनचुन कुमार महतो को आजीवन कारावास की सजा के साथ 50 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया है। न्यायालय ने इस अपराध को समाज में भय और असुरक्षा फैलाने वाला बताते हुए किसी भी प्रकार की रियायत देने से साफ इनकार कर दिया।
यह फैसला अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) रजनी शुक्ला की अदालत ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि नाबालिगों के खिलाफ इस तरह के अमानवीय और क्रूर अपराधों में प्रोबेशन या न्यूनतम सजा देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत होगा।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, वर्ष 2021 में आरोपी चुनचुन कुमार महतो ने लगभग पांच वर्षीय बच्ची को बहला-फुसलाकर जंगल की ओर ले गया। वहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया और बाद में साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से उसकी हत्या कर शव को जंगल में फेंक दिया गया। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था।
सुनवाई के दौरान सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता किशोर कुमार और अधिवक्ता शिवा वर्मा ने अदालत के समक्ष अपराध की गंभीरता, आरोपी के आचरण और समाज पर पड़े प्रभाव को प्रमुखता से रखा। अभियोजन पक्ष ने कठोरतम सजा की मांग की, जिसे अदालत ने उचित माना।
वहीं, बचाव पक्ष ने आरोपी की पारिवारिक और आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए न्यूनतम सजा और प्रोबेशन का लाभ देने की अपील की, लेकिन अदालत ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि ऐसे अपराधों में सहानुभूति दिखाना समाज के लिए घातक संदेश होगा।
अदालत ने दोषी को विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत 20 वर्ष के सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये के अतिरिक्त अर्थदंड का भी आदेश दिया गया है। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी। अर्थदंड अदा न करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
इसके अलावा अदालत ने निर्देश दिए कि वसूल की गई अर्थदंड राशि में से 60 हजार रुपये पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में प्रदान किए जाएं, ताकि उन्हें कुछ आर्थिक राहत मिल सके।
निष्कर्ष:
देहरादून की इस अदालत का फैसला नाबालिगों के खिलाफ अपराध करने वालों के लिए सख्त संदेश है। न्यायालय ने साफ कर दिया है कि मासूमों के साथ दरिंदगी करने वालों के लिए कानून में कोई नरमी नहीं है। यह निर्णय न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में अहम कदम है, बल्कि समाज में कानून के प्रति भरोसा भी मजबूत करता है।


