स्थान: देहरादून, उत्तराखंड
तारीख: 26 अप्रैल 2026
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिए राज्य सरकार ने बड़ी पहल शुरू की है। बदलती जलवायु और सीमित संसाधनों की चुनौतियों से जूझ रहे किसानों को राहत देने के उद्देश्य से अब जलवायु अनुकूल खेती, कम्युनिटी सीड बैंक और क्विनोआ उत्पादन पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
राज्य में यह पहल ग्रामीण उद्यम त्वरण परियोजना (REAP) के तहत लागू की जा रही है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करना, किसानों की आय बढ़ाना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुरूप कृषि प्रणाली विकसित करना है।
पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड में खेती हमेशा से चुनौतियों से घिरी रही है। सीमित कृषि भूमि, मौसम में अस्थिरता, पलायन और बाजार तक सीमित पहुंच जैसे कई कारक किसानों की आय को प्रभावित करते रहे हैं। ऐसे में REAP परियोजना के माध्यम से इन समस्याओं का समाधान निकालने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
चमोली में बनेंगे कम्युनिटी सीड बैंक
परियोजना के तहत वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 115 करोड़ रुपये के बजट प्रावधान के साथ विभिन्न योजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें कृषि विभाग की प्रमुख योजना के रूप में चमोली जिले के 6 ब्लॉकों में 6 कम्युनिटी सीड बैंक स्थापित किए जाएंगे। इस परियोजना पर करीब 81.50 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे और इसे दो वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
कम्युनिटी सीड बैंक के माध्यम से स्थानीय स्तर पर पारंपरिक और उन्नत दोनों प्रकार के बीजों का संरक्षण किया जाएगा। इससे किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध होंगे और उनकी बाहरी बाजारों पर निर्भरता कम होगी। साथ ही यह पहल जैव विविधता के संरक्षण और पारंपरिक फसलों के पुनर्जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
क्विनोआ खेती से बढ़ेगी आय और पोषण सुरक्षा
REAP के तहत जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए क्विनोआ उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। “क्लाइमेट रेजिलिएंट क्विनोआ कल्टीवेशन” परियोजना के तहत उत्तराखंड के सीमांत और पर्वतीय क्षेत्रों में इस फसल को बढ़ावा दिया जाएगा।
क्विनोआ एक उच्च पोषण वाला अनाज है, जिसमें प्रोटीन, फाइबर और खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी और कठिन जलवायु परिस्थितियों में भी आसानी से उगाया जा सकता है, जिससे यह पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल बनती है।
इस परियोजना के तहत करीब 500 हेक्टेयर क्षेत्र में क्विनोआ की खेती को बढ़ावा देने और लगभग 1000 किसानों को इससे जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि वे इस नई फसल को सफलतापूर्वक अपना सकें।
प्रोसेसिंग यूनिट से मिलेगा बेहतर दाम
परियोजना में केवल उत्पादन तक सीमित न रहकर कम्युनिटी आधारित प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित करने पर भी जोर दिया गया है। इससे किसान अपनी उपज का स्थानीय स्तर पर ही मूल्यवर्धन कर सकेंगे, जैसे सफाई, पैकेजिंग और प्रोसेसिंग। इससे उन्हें बाजार में बेहतर कीमत मिलने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
लाखों लोगों को मिलेगा लाभ
REAP योजना के तहत व्यापक स्तर पर काम किया जा रहा है। अनुमान है कि इस परियोजना से करीब 3 लाख 6 हजार 650 से अधिक लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होंगे। स्वयं सहायता समूह (SHGs), आजीविका समूहों और क्लस्टर लेवल फेडरेशन (CLFs) के माध्यम से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों को जोड़ा जाएगा।
परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी के लिए प्रतिष्ठित कंसल्टेंसी फर्म PwC (प्राइसवाटरहाउसकूपर्स) की सेवाएं ली जा रही हैं। यह संस्था योजना की प्लानिंग, क्रियान्वयन और मूल्यांकन में तकनीकी सहयोग प्रदान करेगी, जिससे परियोजना अपने लक्ष्यों को समय पर प्राप्त कर सके।
अपर सचिव ग्राम्य विकास एवं परियोजना निदेशक झरना कमठान के अनुसार, सरकार का उद्देश्य पारंपरिक मोटे अनाज जैसे झंगोरा, मंडुवा (रागी) और चौलाई को पुनः मुख्यधारा में लाना है। इन फसलों के साथ क्विनोआ को जोड़कर एक संतुलित और टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित की जा रही है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड में जलवायु अनुकूल खेती की यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होगी, बल्कि पलायन जैसी गंभीर समस्या को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि इन योजनाओं का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया गया, तो आने वाले वर्षों में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को फिर से लाभकारी और आकर्षक बनाया जा सकेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।



