देहरादून, उत्तराखंड | 27 मई 2026
उत्तराखंड की राजनीति में अनुशासन, सादगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख की पहचान बने पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री जनरल बीसी खंडूड़ी के निधन के साथ ही प्रदेश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया। बुधवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पुत्रवत भाव से उनकी अर्थी को कंधा दिया, जिसने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया।
जनरल खंडूड़ी की अंतिम यात्रा में प्रदेश के कई वरिष्ठ नेता और तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हुए। पूरे प्रदेश में शोक की लहर दिखाई दी और लोगों ने उन्हें अनुशासित राजनीति का प्रतीक बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
जनरल बीसी खंडूड़ी का जीवन सेना और राजनीति दोनों क्षेत्रों में अनुशासन और कार्य संस्कृति का उदाहरण माना जाता है। सेना में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और अपनी कार्यशैली से अलग पहचान बनाई।
कहा जाता है कि एक फौजी कभी रिटायर नहीं होता और जनरल खंडूड़ी ने इसे अपने जीवन में साबित भी किया। सेना से मिले अनुशासन, समय की पाबंदी और कठोर प्रशासनिक सोच को उन्होंने राजनीति में भी पूरी मजबूती से लागू किया।
जनरल खंडूड़ी का राजनीतिक जुड़ाव भी एक मजबूत पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा। वह देश के वरिष्ठ नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के भांजे थे। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने राजनीति को करीब से देखा और समझा था। यही कारण रहा कि वर्ष 1990 में सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया।
करीब 36 वर्षों तक देश सेवा करने के बाद उन्होंने जनसेवा का रास्ता चुना और वर्ष 1991 में पहली बार सांसद बने। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
वाजपेयी सरकार के दौरान शुरू हुई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और देशभर में राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार की बड़ी जिम्मेदारी जनरल खंडूड़ी के कंधों पर थी। उन्होंने इन परियोजनाओं को तेज गति और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया, जिससे उनकी छवि एक कर्मठ और सख्त प्रशासक की बनी।
उत्तराखंड की राजनीति में भी उन्होंने प्रशासनिक अनुशासन की नई परंपरा स्थापित की। अधिकारियों को बैठकों में पूरी तैयारी के साथ पहुंचना पड़ता था और भ्रष्टाचार के मामलों में उनकी जीरो टॉलरेंस नीति साफ दिखाई देती थी।
उनकी कार्यशैली का सबसे चर्चित सूत्र था — “बातें कम, काम ज्यादा”।
जनरल खंडूड़ी पहली बार वर्ष 2007 से 2009 तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वर्ष 2011 से 2012 तक उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री पद संभाला। हालांकि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने “खंडूड़ी हैं जरूरी” का नारा दिया, लेकिन वह स्वयं चुनाव हार गए और कांग्रेस सत्ता में आ गई।
इसके बावजूद जनता और राजनीतिक गलियारों में उनके सम्मान में कभी कमी नहीं आई। वर्ष 2014 में वह फिर गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड की राजनीति में जनरल खंडूड़ी के बाद यदि किसी नेता में अनुशासन और सख्त प्रशासनिक शैली की झलक दिखाई देती है, तो वह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हैं।
सीएम धामी का बचपन भी फौजी माहौल में बीता। उनके पिता सेना में थे और उन्होंने बचपन से ही अनुशासित जीवनशैली को करीब से देखा। बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर उन्हें संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक प्रशिक्षण मिला।
मुख्यमंत्री धामी की कार्यशैली में भी समय की पाबंदी, सख्त प्रशासनिक नियंत्रण और राष्ट्रवाद प्रमुख रूप से दिखाई देता है। बताया जाता है कि उनका दिन सुबह पांच बजे योग, ध्यान और पूजा से शुरू होता है और देर रात तक लगातार सरकारी कार्यों में व्यस्त रहते हैं।
उनकी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए, जिन्हें उत्तराखंड की राजनीति में बड़े बदलाव के रूप में देखा गया। इनमें सख्त नकल विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (यूसीसी), दंगा विरोधी कानून, सख्त मतांतरण विरोधी कानून और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई प्रमुख हैं।
इसके अलावा खेल नीति, युवाओं के लिए रोजगार योजनाएं, वित्तीय प्रबंधन, सतत विकास और खनन नीति जैसे क्षेत्रों में भी सरकार ने कई बड़े फैसले लिए हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस तरह के निर्णय मजबूत इच्छाशक्ति और प्रशासनिक अनुशासन की मांग करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और अनुशासन का प्रभाव भी मुख्यमंत्री धामी की राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
निष्कर्ष
जनरल बीसी खंडूड़ी के निधन के साथ भले ही उत्तराखंड की राजनीति का एक युग समाप्त हुआ हो, लेकिन उनकी अनुशासन, पारदर्शिता और कठोर प्रशासन की विरासत आज भी जीवित दिखाई देती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली और सरकार के फैसलों में उसी विरासत की झलक देखने को मिल रही है। प्रदेश की राजनीति में अनुशासित नेतृत्व और सख्त प्रशासन की यह परंपरा आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


