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उत्तराखंड की दवा फैक्ट्रियों पर बड़ा एक्शन, 24 दवाओं के सैंपल फेल होने पर लाइसेंस निलंबित

देहरादून, उत्तराखंड | शनिवार, 23 मई 2026

उत्तराखंड की दवा निर्माण इकाइयों पर केंद्रीय जांच रिपोर्ट के बाद बड़ा प्रशासनिक शिकंजा कस दिया गया है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की अप्रैल माह की गुणवत्ता जांच रिपोर्ट में राज्य में निर्मित 24 दवाओं के सैंपल फेल पाए जाने के बाद राज्य औषधि प्रशासन ने संबंधित कंपनियों के उत्पाद लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं।

कार्रवाई की जद में हरिद्वार, रुड़की, देहरादून, काशीपुर और कोटद्वार की कई दवा निर्माण इकाइयां आई हैं। औषधि प्रशासन ने फेल पाए गए बैचों की बिक्री पर तत्काल रोक लगाते हुए बाजार से दवाओं की वापसी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की ओर से देशभर से लिए गए कुल 120 दवा सैंपल जांच में फेल पाए गए हैं। इनमें से 24 सैंपल अकेले उत्तराखंड की दवा फैक्ट्रियों के हैं। यह आंकड़ा राज्य की दवा निर्माण व्यवस्था और गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

जांच में जिन दवाओं के सैंपल फेल पाए गए हैं, उनमें खांसी-जुकाम, बुखार, पेट के कीड़ों, मानसिक रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, एसिडिटी, बैक्टीरियल संक्रमण और गर्भ संबंधी उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इन दवाओं की गुणवत्ता खराब होना मरीजों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

राज्य औषधि नियंत्रक ताजबर सिंह ने बताया कि सीडीएससीओ की रिपोर्ट मिलते ही संबंधित दवा निर्माण इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई। उन्होंने कहा कि प्रदेशभर के औषधि निरीक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि मेडिकल स्टोरों और दवा गोदामों की सघन जांच कर यह सुनिश्चित किया जाए कि फेल बैच की कोई भी दवा बाजार में उपलब्ध न रहे।

औषधि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मरीजों की सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। दोषी कंपनियों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। विभाग ने संबंधित कंपनियों से जवाब भी तलब किया है।

सबसे गंभीर मामला देहरादून स्थित मैनकेयर लेबोरेटरीज का सामने आया है। यहां निर्मित एल्बेंडाजोल टैबलेट के चार अलग-अलग सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल पाए गए हैं। यह दवा आमतौर पर बच्चों में पेट के कीड़ों के इलाज के लिए दी जाती है। विभाग ने इस दवा को तत्काल प्रभाव से बाजार से हटाने के आदेश जारी किए हैं।

जांच में फेल पाई गई प्रमुख दवाओं में मिसोप्रोस्टोल टैबलेट्स, पेप्सिन फंगल डायस्टेज सिरप, डाइवलप्रोएक्स सोडियम ईआर टैबलेट, जाइलोमेटाजोलिन नेजल ड्रॉप्स, टेल्मिसार्टन टैबलेट, मेटोप्रोलोल टैबलेट, आइबुप्रोफेन-पैरासिटामोल टैबलेट, टेरब्यूटालिन कॉम्बिनेशन सिरप, हायोसिन ब्यूटिलब्रोमाइड इंजेक्शन, सिप्रोफ्लोक्सासिन टैबलेट और कैल्शियम-विटामिन डी थ्री टैबलेट शामिल हैं।

इन दवाओं का निर्माण हरिद्वार, रुड़की, देहरादून, काशीपुर और कोटद्वार स्थित विभिन्न फार्मा कंपनियों द्वारा किया गया था। कई दवाएं रोजमर्रा के इलाज में बड़े पैमाने पर उपयोग की जाती हैं, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।

स्वास्थ्य विभाग की टीम अब बाजार में उपलब्ध स्टॉक की जांच कर रही है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि फेल पाए गए बैच किन-किन राज्यों और मेडिकल स्टोरों तक पहुंचे थे। जरूरत पड़ने पर बड़े स्तर पर रिकॉल अभियान भी चलाया जा सकता है।

फार्मा उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड देश के बड़े फार्मा हब के रूप में जाना जाता है। ऐसे में बड़ी संख्या में दवाओं के सैंपल फेल होना राज्य की औद्योगिक छवि के लिए भी चिंता का विषय है।

निष्कर्ष

उत्तराखंड की दवा फैक्ट्रियों से जुड़े 24 सैंपल फेल होने का मामला स्वास्थ्य व्यवस्था और दवा गुणवत्ता नियंत्रण पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने लाइसेंस निलंबन और बाजार से दवाएं हटाने जैसी कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच के बाद दोषी कंपनियों के खिलाफ आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था को कितना मजबूत बनाया जाता है।

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