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उत्तराखंड विधानसभा विशेष सत्र में महिला आरक्षण पर घमासान, ‘नारी शक्ति’ पर गरजी सत्ता-विपक्ष, सर्वसम्मति की अपील

स्थान: देहरादून, उत्तराखंड
तारीख: 28 अप्रैल 2026

देहरादून में आयोजित उत्तराखंड विधानसभा के एक दिवसीय विशेष सत्र में ‘नारी सम्मान-लोकतंत्र में अधिकार’ विषय के तहत महिला आरक्षण को लेकर जोरदार बहस देखने को मिली। सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने नजर आए, जहां एक ओर सरकार ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं विपक्ष ने इसके क्रियान्वयन को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए।


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन की शुरुआत उत्तराखंड आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को याद करते हुए की। उन्होंने कहा कि राज्य के निर्माण से लेकर विकास तक महिलाओं का योगदान हमेशा निर्णायक रहा है और अब समय आ गया है कि उन्हें राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में भी समान भागीदारी मिले।


सीएम धामी ने भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति का प्रतीक बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाया गया महिला आरक्षण प्रावधान केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं को नीति निर्माण में सशक्त भूमिका देने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण से सामाजिक और राजनीतिक संतुलन मजबूत होगा।


विपक्ष पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ राजनीतिक दल इस मुद्दे पर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि सरकार की मंशा पूरी तरह स्पष्ट है। उन्होंने सदन से अपील की कि महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर राजनीति से ऊपर उठकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया जाए, ताकि समाज को सकारात्मक संदेश दिया जा सके।


वहीं, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है और कांग्रेस हमेशा से इसके पक्ष में रही है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट करने को कहा कि यह कानून कब लागू होगा और इसके लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।


आर्य ने आरोप लगाया कि सरकार इस महत्वपूर्ण मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। उनका कहना था कि केवल घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस क्रियान्वयन सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि महिलाओं को वास्तविक लाभ मिल सके।


विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खंडूरी ने इस विशेष सत्र को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सभी वर्गों की भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने सभी विधायकों से अपील की कि वे इस मुद्दे को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखें और एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करें।


सत्ता पक्ष के विधायकों ने सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि महिला आरक्षण लागू होने से राजनीति में नई ऊर्जा आएगी और जमीनी स्तर की समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह केवल राजनीतिक विरोध के लिए इस मुद्दे को विवादित बना रहा है।


दूसरी ओर, विपक्षी विधायकों ने सरकार को घेरते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण केवल आरक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने शिक्षा, रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता बताई।


सत्र के दौरान कई मौकों पर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली, जिससे सदन का माहौल गर्म रहा। हालांकि, इस बहस के बीच यह स्पष्ट हो गया कि महिला सशक्तिकरण अब प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ चुका है।


निष्कर्ष:
उत्तराखंड विधानसभा का यह विशेष सत्र महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस का अहम मंच बन गया। जहां एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक पहल बताकर समर्थन जुटाने में लगी है, वहीं विपक्ष इसके क्रियान्वयन और मंशा पर सवाल उठा रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सर्वसम्मति की अपील क्या वास्तविक सहमति में बदलती है या यह मुद्दा राजनीतिक बहस तक ही सीमित रह जाता है। फिलहाल, महिला आरक्षण पर चर्चा ने राज्य की राजनीति को नई दिशा देने के संकेत जरूर दे दिए हैं।

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