स्थान : देहरादून/चमोली, उत्तराखंड
दिनांक : 14 अगस्त 2026
देहरादून। चमोली जिले में विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में गुरुवार को अचानक पानी और मलबा घुसने से कई श्रमिकों के फंसने की घटना ने उत्तरकाशी के सिल्क्यारा सुरंग हादसे की भयावह यादें ताजा कर दीं। हालांकि चमोली में राहत और बचाव दल ने तेजी से कार्रवाई करते हुए अधिकांश श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के दौरान सुरक्षा इंतजामों और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अचानक सुरंग में घुसा पानी और मलबा
चमोली जिले में टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की सुरंग में गुरुवार को अचानक पानी और मलबा घुस गया। उस समय सुरंग के भीतर श्रमिक निर्माण कार्य में जुटे थे। पानी और मलबा आने के बाद वहां अफरा-तफरी मच गई और कई श्रमिक सुरंग के अंदर फंस गए।
घटना की सूचना मिलते ही राहत और बचाव दल सक्रिय हो गए। बचाव अभियान को प्राथमिकता देते हुए सुरंग के भीतर फंसे श्रमिकों तक पहुंचने और उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने का प्रयास तेज किया गया।
सिल्क्यारा हादसे की याद हुई ताजा
चमोली की घटना ने 12 नवंबर 2023 को उत्तरकाशी के सिल्क्यारा-बड़कोट सुरंग में हुए हादसे की यादें फिर ताजा कर दीं। सिल्क्यारा में निर्माणाधीन सुरंग का एक हिस्सा भूस्खलन के कारण धंस गया था। हादसे के समय सुरंग के भीतर 41 श्रमिक मौजूद थे और निकासी मार्ग बंद हो जाने के कारण सभी श्रमिक अंदर फंस गए थे।
17 दिनों तक सुरंग में फंसे रहे थे 41 श्रमिक
सिल्क्यारा हादसे में फंसे 41 श्रमिकों को बाहर निकालना देश के सबसे चुनौतीपूर्ण बचाव अभियानों में शामिल रहा। करीब 17 दिनों तक श्रमिक सुरंग के भीतर फंसे रहे। केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों ने संयुक्त रूप से बचाव अभियान चलाया।
बचाव अभियान के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से आधुनिक मशीनें और विशेषज्ञों की मदद मंगाई गई। लंबे और कठिन अभियान के बाद रैट माइनर्स की मदद से सभी 41 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था। इस अभियान ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था।
सुरंग सुरक्षा और आपदा प्रबंधन पर फिर उठे सवाल
सिल्क्यारा हादसे के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में सुरंग निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों, आपातकालीन निकासी मार्गों, भूगर्भीय जोखिमों और बचाव व्यवस्था को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी। अब विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना में हुई घटना ने एक बार फिर इन विषयों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र की जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों को देखते हुए बड़े निर्माण कार्यों में जोखिम का लगातार आकलन, मौसम और भूगर्भीय गतिविधियों की निगरानी तथा आपात स्थिति से निपटने की तैयारी बेहद जरूरी है।
समय पर कार्रवाई से बड़ा हादसा टला
चमोली की घटना में राहत की बात यह रही कि प्रशासन और बचाव एजेंसियों ने सूचना मिलते ही अभियान शुरू कर दिया। तेजी से किए गए राहत एवं बचाव प्रयासों के चलते सुरंग में फंसे अधिकांश श्रमिकों को समय रहते बाहर निकाल लिया गया।
हालांकि घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में निर्माणाधीन सुरंगों में छोटी सी प्राकृतिक या तकनीकी घटना भी बड़े संकट में बदल सकती है। ऐसे में सुरक्षा प्रोटोकॉल की नियमित समीक्षा और आपातकालीन व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है।
हिमालयी परियोजनाओं में पहले भी हो चुके हैं हादसे
उत्तराखंड में जलविद्युत और सुरंग परियोजनाओं के निर्माण के दौरान पहले भी कई गंभीर घटनाएं सामने आती रही हैं। इनमें चमोली और उत्तरकाशी के साथ-साथ अन्य हिमालयी क्षेत्रों की परियोजनाएं शामिल हैं।
वर्ष 2010: चमोली जिले की ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना क्षेत्र में भूस्खलन की घटना में तीन मजदूरों की मौत हुई थी।
वर्ष 2011: ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना में ट्रायल रन के दौरान चट्टान गिरने से एक व्यक्ति की मौत हुई।
वर्ष 2021: चमोली की तपोवन-विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना क्षेत्र में ग्लेशियर फटने की घटना में 100 से अधिक श्रमिक घायल हुए थे।
वर्ष 2023: उत्तरकाशी के सिल्क्यारा में निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा धंसने से 41 श्रमिक 17 दिनों तक सुरंग के भीतर फंसे रहे।
वर्ष 2025: तपोवन-विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना में भूस्खलन की घटना में आठ मजदूर घायल हुए।
वर्ष 2025: पीपलकोटी-विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना में लोको ट्रॉली हादसे में 15 मजदूरों के घायल होने की घटना सामने आई।
वर्ष 2026: सिल्क्यारा सुरंग में मलबा गिरने की घटना में एक व्यक्ति की मौत की जानकारी सामने आई।
हर घटना से मिलती है सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की सीख
चमोली की ताजा घटना और सिल्क्यारा हादसे के बीच सबसे बड़ा समान पहलू सुरंग के भीतर अचानक उत्पन्न हुआ संकट है। हालांकि दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन इन घटनाओं से हिमालयी क्षेत्रों में निर्माण कार्यों के दौरान प्राकृतिक जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करने की सीख मिलती है।
सुरंग निर्माण से पहले भूगर्भीय स्थिति का विस्तृत आकलन, निर्माण के दौरान लगातार निगरानी, पर्याप्त निकासी मार्ग, संचार व्यवस्था और प्रशिक्षित बचाव दल जैसी व्यवस्थाएं किसी भी आपात स्थिति में जान बचाने में निर्णायक साबित हो सकती हैं।
निष्कर्ष
चमोली की विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना की सुरंग में पानी और मलबा घुसने की घटना ने उत्तराखंड में सुरंग निर्माण से जुड़े जोखिमों को फिर सामने ला दिया है। सिल्क्यारा में 41 श्रमिकों को 17 दिनों तक सुरंग के भीतर फंसे रहने के बाद सुरक्षित निकालने का अनुभव आज भी देश की बड़ी बचाव घटनाओं में गिना जाता है। चमोली की घटना में समय पर राहत और बचाव अभियान से स्थिति को संभाल लिया गया, लेकिन लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि हिमालयी परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों, जोखिम आकलन और आपदा प्रबंधन तंत्र की नियमित समीक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


