स्थान : देहरादून, उत्तराखंड
दिनांक : 14 अगस्त 2026
देहरादून। भूकंप की सटीक भविष्यवाणी आज भी विज्ञान के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। दुनिया भर में वैज्ञानिक इस दिशा में लगातार शोध कर रहे हैं। इसी क्रम में देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अध्ययन से भूकंप से पहले धरती के भीतर होने वाले बदलावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत सामने आया है। अध्ययन में पाया गया कि कुछ भूकंपों से पहले जमीन के भीतर से निकलने वाली रैडान गैस के स्तर में असामान्य उतार-चढ़ाव दर्ज हुआ।
गढ़वाल के दस साल के आंकड़ों का किया गया विश्लेषण
वैज्ञानिकों ने वर्ष 2009 से 2018 के बीच गढ़वाल क्षेत्र में आए तीन या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों से जुड़े आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया। अध्ययन के दौरान जमीन में लगभग 10 मीटर की गहराई पर रैडान गैस की लगातार निगरानी की गई। प्रत्येक 15 मिनट में आंकड़े दर्ज किए गए, जिससे एक दिन में 96 रिकॉर्ड और पूरे अध्ययन काल में लाखों आंकड़े तैयार हुए।
यह शोध वाडिया संस्थान की टिहरी जिले के घुत्तू स्थित भूकंप वेधशाला में किया गया। रैडान के साथ हवा का तापमान, वायुमंडलीय दबाव, वर्षा, भूमिगत तापमान, भूजल स्तर और भूकंपीय कंपन जैसे अन्य कारकों की भी निगरानी की गई। इसका उद्देश्य यह समझना था कि रैडान में होने वाला बदलाव मौसम और जल संबंधी परिस्थितियों का परिणाम है या इसके पीछे धरती के भीतर चल रही भूगर्भीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं।
2013 के भूकंप से पहले आठ बार बढ़ा रैडान स्तर
अध्ययन में 7 अप्रैल 2013 को आए 3.8 तीव्रता के भूकंप का उदाहरण विशेष रूप से सामने आया। वैज्ञानिकों के अनुसार इस भूकंप से पहले रैडान के स्तर में आठ असामान्य बढ़ोतरी दर्ज की गई थीं। इनमें 4 अप्रैल को तीन, 5 अप्रैल को तीन और 6 अप्रैल को दो बार गैस का प्रवाह सामान्य सीमा से ऊपर गया।
शोधकर्ताओं का मानना है कि भूगर्भीय तनाव बढ़ने के दौरान चट्टानों में सूक्ष्म दरारें विकसित हो सकती हैं। इन दरारों के बनने या खुलने से रैडान गैस के बाहर निकलने का रास्ता बदल सकता है और इसके स्तर में असामान्य वृद्धि दिखाई दे सकती है।
27 जून 2013 के भूकंप से पहले दिखा दोतरफा बदलाव
27 जून 2013 को आए 3.5 तीव्रता के भूकंप से पहले रैडान के व्यवहार में अलग तरह की असामान्यता दर्ज की गई। इस दौरान गैस के स्तर में सामान्य से अधिक वृद्धि के साथ कुछ समय के लिए असामान्य कमी भी देखी गई।
वैज्ञानिकों के अनुसार रैडान का स्तर कम होना भी महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। सूक्ष्म दरारों के अस्थायी रूप से बंद होने, गैस के रास्ते में रुकावट आने या चट्टानों के भीतर मौजूद द्रव की स्थिति में बदलाव से रैडान का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
2015 और 2018 के भूकंपों में भी सामने आए बदलाव
शोध के दौरान 6 अक्टूबर 2015 को आए 3.8 तीव्रता के भूकंप से पहले 1 अक्टूबर को रैडान के स्तर में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई। इसके अलावा 6 दिसंबर 2015 को आए 3.4 तीव्रता के भूकंप से एक दिन पहले भी रैडान का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। यह भूकंप निगरानी केंद्र से लगभग 267 किलोमीटर की दूरी पर आया था।
वहीं 17 जून 2018 को आए 3.8 तीव्रता के भूकंप से तीन दिन पहले, 14 जून को रैडान के स्तर में असामान्य कमी दर्ज की गई। इन घटनाओं ने वैज्ञानिकों को रैडान और भूकंपीय गतिविधि के बीच संभावित संबंध को लेकर आगे अध्ययन करने का आधार दिया।
क्या है रैडान गैस और क्यों महत्वपूर्ण है इसका अध्ययन
रैडान एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी गैस है, जो चट्टानों में मौजूद यूरेनियम के प्राकृतिक क्षय से बनती है। यह जमीन और चट्टानों में मौजूद सूक्ष्म दरारों के माध्यम से सतह की ओर पहुंचती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार जब धरती के भीतर भूगर्भीय तनाव में बदलाव होता है तो चट्टानों में नई सूक्ष्म दरारें बन सकती हैं या पहले से मौजूद दरारें खुल सकती हैं। ऐसी स्थिति में रैडान के प्रवाह में वृद्धि संभव है। दूसरी ओर, दरारों के बंद होने या उनमें पानी भरने जैसी परिस्थितियों में गैस का प्रवाह कम भी हो सकता है।
मौसम और भूजल के प्रभाव को अलग करना बड़ी चुनौती
रैडान गैस का स्तर केवल भूकंपीय गतिविधियों से ही प्रभावित नहीं होता। तापमान, वर्षा, वायुमंडलीय दबाव और भूजल की स्थिति भी इसके व्यवहार को बदल सकती है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान इन सभी पर्यावरणीय और भूगर्भीय संकेतकों को एक साथ रिकॉर्ड किया।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य रैडान में होने वाले वास्तविक भूकंपीय संकेतों और सामान्य प्राकृतिक उतार-चढ़ाव के बीच अंतर को समझना है। यही अंतर भविष्य में किसी संभावित पूर्व-संकेत की विश्वसनीयता निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अभी भूकंप की भविष्यवाणी नहीं, लेकिन शोध की दिशा में अहम उपलब्धि
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों का अध्ययन यह दावा नहीं करता कि रैडान के स्तर में बदलाव देखकर भूकंप की निश्चित तारीख या समय बताया जा सकता है। हालांकि, शोध से यह संकेत जरूर मिला है कि कुछ भूकंपों से पहले रैडान के व्यवहार में असामान्य परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
यह अध्ययन मार्च 2026 में रेडियोएनालिटिकल एंड न्यूक्लियर केमिस्ट्री जर्नल में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस संबंध की पुष्टि और अधिक विश्वसनीय निष्कर्षों के लिए लंबे समय तक निगरानी, अधिक स्थानों से आंकड़े और व्यापक भूकंपीय डेटा का विश्लेषण आवश्यक होगा।
निष्कर्ष
भूकंप का सटीक पूर्वानुमान अभी वैज्ञानिकों के लिए संभव नहीं है, लेकिन रैडान गैस के व्यवहार में सामने आए ये बदलाव इस दिशा में शोध की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकते हैं। गढ़वाल जैसे भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में लगातार निगरानी और विभिन्न वैज्ञानिक संकेतकों के संयुक्त अध्ययन से भविष्य में भूकंप से जुड़े संभावित पूर्व-संकेतों को समझने की क्षमता बेहतर हो सकती है। फिलहाल रैडान को भूकंप की निश्चित चेतावनी मानना उचित नहीं होगा, लेकिन इसके असामान्य व्यवहार पर वैज्ञानिकों की नजर भविष्य के शोध के लिए महत्वपूर्ण आधार जरूर तैयार कर रही है।


