हरिद्वार, उत्तराखंड | 29 अप्रैल 2026
हरिद्वार में जिला योजना समिति की महत्वपूर्ण बैठक उस समय हंगामे की भेंट चढ़ गई, जब विपक्षी विधायकों ने अपने प्रस्ताव एजेंडे में शामिल न होने का आरोप लगाते हुए जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। कैबिनेट मंत्री और जिला प्रभारी सतपाल महाराज की अध्यक्षता में आयोजित यह बैठक शुरू होते ही विवादों में घिर गई।
बैठक की शुरुआत से पहले ही कांग्रेस और बसपा के छह विधायक अपनी सीटों से खड़े हो गए और एजेंडे में अपने क्षेत्रों से जुड़े प्रस्ताव शामिल न किए जाने पर आपत्ति जताने लगे। देखते ही देखते मामला इतना बढ़ गया कि विधायकों ने एजेंडे की फाइलें फेंक दीं और बैठक का बहिष्कार करते हुए हॉल से बाहर निकल गए।
विरोध करने वाले विधायकों में कांग्रेस के रवि बहादुर, अनुपमा रावत, फुरकान अहमद, ममता राकेश, वीरेंद्र जाति और बसपा के मोहम्मद शहजाद शामिल थे। बैठक से बाहर निकलने के बाद सभी विधायकों ने परिसर में धरना दिया और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
विधायकों का आरोप है कि जिला योजना में उनके क्षेत्रों से जुड़े बुनियादी मुद्दों—जैसे बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा—को नजरअंदाज किया गया। उनका कहना है कि 84 गांवों से जुड़े विकास प्रस्तावों को एजेंडे में जगह नहीं दी गई, जबकि ठेकेदारों और अधिकारियों के प्रस्तावों को प्राथमिकता दी जा रही है।
कांग्रेस विधायक अनुपमा रावत ने कहा कि जब जनप्रतिनिधियों के प्रस्ताव ही शामिल नहीं किए जाएंगे, तो ऐसी बैठक का कोई औचित्य नहीं रह जाता। वहीं, ममता राकेश ने सवाल उठाया कि आखिर किसके दबाव में विपक्षी विधायकों के सुझावों को नजरअंदाज किया गया।
बसपा विधायक मोहम्मद शहजाद ने भी प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि हरिद्वार जिले में ठेकेदारों का प्रभाव बढ़ गया है और अधिकारियों द्वारा उन्हीं के प्रस्तावों को मंजूरी दी जा रही है। उन्होंने कहा कि जब जनहित की आवाज को अनसुना किया जाएगा, तो विपक्ष के पास विरोध के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
वहीं, जिला प्रभारी मंत्री सतपाल महाराज ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बैठक में सभी विभागों और क्षेत्रों से जुड़े प्रस्ताव शामिल किए गए थे। उन्होंने कहा कि विपक्ष का काम ही विरोध करना है और बार-बार समझाने के बावजूद विधायक बैठक में बैठने को तैयार नहीं हुए।
निष्कर्ष
हरिद्वार की जिला योजना बैठक में हुआ यह हंगामा प्रदेश की राजनीति में बढ़ते टकराव को दर्शाता है। जहां एक ओर विपक्ष जनहित के मुद्दों की अनदेखी का आरोप लगा रहा है, वहीं सरकार इसे राजनीतिक विरोध करार दे रही है। ऐसे हालात में विकास कार्यों की दिशा और गति पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय स्थापित हो पाता है या नहीं।


