देहरादून, उत्तराखंड | 29 अप्रैल 2026
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान बेरोजगारों का आक्रोश खुलकर सामने आया। उत्तराखंड बेरोजगार संघ ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर विधानसभा घेराव का प्रयास किया, जिसे पुलिस ने रिस्पना पुल के पास बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने वहीं धरना देकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
प्रदर्शन के दौरान बेरोजगार संघ के कार्यकर्ता हाथों में पोस्टर लेकर अपनी मांगों को जोरदार तरीके से उठाते नजर आए। संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल ने आरोप लगाया कि विधानसभा में डीडीओ पद पर मयंक सिंघल की नियुक्ति संदिग्ध है और उनके दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल उठ चुके हैं।
राम कंडवाल का कहना है कि इस मामले से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज पहले ही विधानसभा सचिव को सौंपे जा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से भी कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया जा रहा है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि विधानसभा अध्यक्ष इस मामले में कार्रवाई करने में असमर्थ हैं, तो उन्हें नैतिक आधार पर अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। उनका कहना है कि इस तरह की नियुक्तियों से प्रदेश के योग्य और प्रतिभाशाली युवाओं के अधिकारों का हनन हो रहा है।
बेरोजगार संघ ने इस मुद्दे के साथ-साथ अन्य मांगों को भी जोर-शोर से उठाया। उन्होंने उत्तराखंड की विभिन्न भर्तियों की लंबित वेटिंग लिस्ट को तत्काल जारी करने की मांग की। साथ ही उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) का नया परीक्षा कैलेंडर जल्द जारी करने की भी मांग की गई।
प्रदर्शनकारियों ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लेक्चरर भर्ती परीक्षा की तिथि में बदलाव की मांग भी उठाई। उनका कहना है कि यूपी पीजीटी और यूकेपीएससी की परीक्षाएं एक ही दिन निर्धारित होने से अभ्यर्थियों के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो गई है, जिससे वे दोनों परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं।
बेरोजगार संघ के कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा और प्रदेशभर में व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
निष्कर्ष
देहरादून में उठी यह आवाज केवल एक नियुक्ति विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश के हजारों बेरोजगार युवाओं की नाराजगी और निराशा को दर्शाती है। यदि समय रहते इन मुद्दों का समाधान नहीं किया गया, तो यह असंतोष बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसका असर प्रशासन और सरकार दोनों पर पड़ेगा।


